धर्म-अध्यात्म

शव संस्कार परंपरा: नाक-कान में रुई लगाने की धार्मिक और सांस्कृतिक व्याख्या

nidhi
13 Jun 2026 1:48 PM IST
शव संस्कार परंपरा: नाक-कान में रुई लगाने की धार्मिक और सांस्कृतिक व्याख्या
x
3. अंतिम संस्कार की प्रक्रिया में नाक और कान में रुई लगाने का महत्व
Garuda Puran: सनातन धर्म में जन्म से लेकर मृत्यु तक कुल 16 संस्कारों का वर्णन मिलता है, जिनमें अंतिम संस्कार को सबसे महत्वपूर्ण माना गया है. हिंदू धर्मग्रंथों, विशेषकर गरुड़ पुराण में मृत्यु और उसके बाद किए जाने वाले कर्मों और नियमों का विस्तार से उल्लेख मिलता है. आपने अक्सर देखा होगा कि किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसके नाक और कान में रुई लगा दी जाती है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि ऐसा क्यों किया जाता है? क्या यह केवल वर्षों पुरानी परंपरा है या इसके पीछे कोई धार्मिक और वैज्ञानिक कारण भी छिपा है? आइए जानते हैं.
कान और नाक में रुई डालने का महत्व
गरुड़ पुराण में मानव शरीर को नौ द्वारों का घर बताया गया है. इनमें दो आंखें, दो कान, दो नथुने, एक मुंह और दो विसर्जन अंग शामिल हैं. मान्यता है कि जब आत्मा शरीर छोड़ती है, तो वह इन्हीं मार्गों में से किसी एक से बाहर निकलती है.
सोने के कणों और तुलसी की सुरक्षा
शास्त्रों के अनुसार, अंतिम संस्कार से पहले मृतक के कुछ खुले अंगों में सोने के छोटे कण या तुलसी के पत्ते रखे जाते हैं. सोना पवित्र धातु माना जाता है, जबकि तुलसी को मोक्ष प्रदान करने वाली माना गया है. नाक और कान के छिद्र अपेक्षाकृत बड़े होने के कारण ये वस्तुएं बाहर न गिरें, इसलिए वहां रुई लगा दी जाती है.
जीवात्मा के पुनः प्रवेश को रोकने की मान्यता
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मृत्यु के तुरंत बाद जीवात्मा का शरीर के प्रति मोह पूरी तरह समाप्त नहीं होता. इसलिए वह अपनी देह में दोबारा प्रवेश करने का प्रयास कर सकती है. ऐसे में शरीर के खुले मार्गों को रुई से बंद कर दिया जाता है, ताकि आत्मा की आगे की यात्रा में कोई बाधा न आए.
नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षा
गरुड़ पुराण में यह भी उल्लेख मिलता है कि मृत्यु के बाद शरीर निष्प्राण हो जाता है. ऐसी स्थिति में नकारात्मक शक्तियां या अशुभ ऊर्जाएं शरीर के खुले अंगों के माध्यम से उसमें प्रवेश कर सकती हैं. रुई को एक प्रकार का सुरक्षा कवच माना जाता है, जो इन प्रभावों से बचाव का प्रतीक है.
वैज्ञानिक दृष्टिकोण
मृत्यु के बाद शरीर में अपघटन (सड़न) की प्रक्रिया शुरू हो जाती है, जिससे बैक्टीरिया और अन्य सूक्ष्म जीव तेजी से बढ़ने लगते हैं. नाक और कान जैसे छिद्रों को रुई से बंद करने से शरीर से निकलने वाले तरल पदार्थों और संक्रमण के प्रसार को कुछ हद तक नियंत्रित करने में मदद मिलती है.
मृत्यु के बाद शरीर के अंदर गैसें बनने लगती हैं और कुछ द्रव भी बाहर निकल सकते हैं. ऐसे में नाक और कान में रुई लगाने से इन स्रावों को नियंत्रित करने में सहायता मिलती है तथा शव को व्यवस्थित और सम्मानजनक स्थिति में रखने में मदद मिलती है.
Next Story