धर्म-अध्यात्म

सरगी से चंद्र दर्शन तक, जानिए करवा चौथ की रस्मों का अर्थ

nidhi
23 Oct 2026 10:48 AM IST
सरगी से चंद्र दर्शन तक, जानिए करवा चौथ की रस्मों का अर्थ
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रिश्तों का उत्सव भी है करवा चौथ

धर्म डेस्क : करवा चौथ का नाम आते ही दिनभर निर्जला व्रत रखने और रात में चंद्र दर्शन के बाद उपवास खोलने की परंपरा याद आती है। लेकिन इस पर्व की पहचान केवल अन्न और जल त्यागने तक सीमित नहीं है। सरगी, पूजा का संकल्प, श्रृंगार, कथा सुनना, करवे का उपयोग और चंद्रमा को अर्घ्य देना भी इसके महत्वपूर्ण हिस्से हैं। इन रस्मों में आस्था के साथ पारिवारिक स्नेह और साथ मिलकर त्योहार मनाने की भावना दिखाई देती है।

करवा चौथ मुख्य रूप से उत्तर भारत में विवाहित महिलाओं द्वारा मनाया जाने वाला पर्व है। परंपरागत रूप से महिलाएं पति की दीर्घायु और परिवार के कल्याण की कामना करती हैं। हालांकि, इसकी सभी रस्में हर क्षेत्र और परिवार में एक जैसी नहीं होतीं। किसी घर में सरगी का विशेष महत्व होता है, तो कहीं सामूहिक कथा और पूजन प्रमुख होते हैं।
सरगी में जुड़ा होता है अपनापन
कई परिवारों, विशेषकर पंजाबी परंपरा में, करवा चौथ की शुरुआत सूर्योदय से पहले सरगी खाने से होती है। यह प्रायः सास की ओर से बहू को दी जाती है। इसमें परिवार की परंपरा के अनुसार फल, मेवे, मिठाई और अन्य खाद्य पदार्थ शामिल हो सकते हैं। सूर्योदय से पहले सरगी ग्रहण करने के बाद दिनभर के व्रत का क्रम शुरू होता है।
सरगी को रिश्तों में स्नेह व्यक्त करने के अवसर के रूप में भी समझा जा सकता है। इसे तैयार करना, साथ बैठना और शुभकामनाएं देना परिवार के सदस्यों को जोड़ सकता है। हालांकि, जिन परिवारों में सरगी की परंपरा नहीं है, वहां इसका न होना त्योहार की श्रद्धा को कम नहीं करता। स्थानीय रीति और पारिवारिक परंपरा का अपना महत्व है।
संकल्प और पूजा से जुड़ी है व्रत की भावना
करवा चौथ की पारंपरिक पूजा में देवी पार्वती, भगवान शिव, गणेश और कार्तिकेय की आराधना का उल्लेख मिलता है। चंद्रमा की पूजा भी इस व्रत का हिस्सा है। संकल्प के माध्यम से व्रत रखने वाली महिला अपनी प्रार्थना और उद्देश्य को व्यक्त करती है। पूजा की सामग्री तथा क्रम परिवार की प्रचलित विधि के अनुसार बदल सकते हैं।
इस अवसर पर पूजा का भाव समझना उतना ही उपयोगी है जितना उसकी तैयारी करना। परिवार की खुशहाली की कामना के साथ आपसी सम्मान, धैर्य और सहयोग का संकल्प लिया जा सकता है। रिश्तों की मजबूती रोजमर्रा के व्यवहार में दिखाई देती है। इसलिए त्योहार के दिन व्यक्त किया गया स्नेह आगे भी साथ निभाने की भावना से जुड़ सकता है।
श्रृंगार का महत्व, दिखावे की जरूरत नहीं
करवा चौथ पर कई महिलाएं पारंपरिक वस्त्र पहनती हैं, मेहंदी लगाती हैं और अपनी रीति के अनुसार श्रृंगार करती हैं। इसे सुहाग और उत्सव की खुशी से जोड़ा जाता है। पूजा से पहले तैयार होना पर्व के प्रति उत्साह व्यक्त करने का तरीका भी है। लेकिन श्रृंगार की शैली, वस्त्रों के रंग और आभूषणों को लेकर सभी परिवारों में समान नियम नहीं होते।
त्योहार मनाने के लिए महंगे कपड़े या भारी आभूषण जरूरी मानना उचित नहीं है। कोई महिला सादगी से पूजा करना चाहे, तो उसके उत्साह और श्रद्धा का सम्मान होना चाहिए। उपहार और सजावट खुशी बढ़ा सकते हैं, लेकिन उन्हें रिश्ते की गहराई मापने का आधार नहीं बनाना चाहिए।
कथा और करवे की पूजा क्यों होती है?
कई स्थानों पर महिलाएं एक साथ बैठकर करवा चौथ की कथा सुनती हैं। कुछ परंपराओं में पूजा की थालियां या करवे फेरने और पारंपरिक गीत गाने की रस्म होती है। कथा के प्रचलित रूपों में वीरावती का प्रसंग भी मिलता है। यह सामूहिक आयोजन महिलाओं को एक-दूसरे से मिलने और पारिवारिक परंपराएं साझा करने का अवसर देता है।
करवा पूजा में उपयोग किया जाने वाला छोटा पात्र है, जो प्रायः मिट्टी का होता है। अलग-अलग परिवारों में उसे सजाने, भरने और पूजन में रखने की विधि भिन्न हो सकती है। बच्चों और पहली बार पर्व मना रहे लोगों को इन वस्तुओं का उपयोग समझाना परंपरा से परिचय कराने का सहज तरीका है। कथा के प्रसंग धार्मिक और लोकपरंपरा के संदर्भ में समझे जाने चाहिए।
चंद्र दर्शन और व्रत खोलने की परंपरा
चंद्रोदय के बाद चंद्रमा के दर्शन, अर्घ्य और प्रार्थना करने के पश्चात व्रत खोलने की परंपरा है। कई परिवारों में छलनी से पहले चंद्रमा और फिर पति का चेहरा देखा जाता है। इसके बाद पति के हाथ से जल ग्रहण किया जाता है। हालांकि, छलनी और व्रत खोलने के इस विशेष क्रम को सभी क्षेत्रों की अनिवार्य विधि नहीं माना जाना चाहिए।
स्वास्थ्य और सहयोग का ध्यान भी जरूरी
निर्जला व्रत हर महिला के लिए उपयुक्त नहीं होता। गर्भावस्था, स्तनपान, मधुमेह या नियमित दवाएं लेने की स्थिति में उपवास का निर्णय चिकित्सकीय सलाह से करना चाहिए। स्वास्थ्य की जरूरत के अनुसार पूजा में भाग लेने का तरीका बदला जा सकता है।
परिवार का सहयोग इस दिन को सहज बना सकता है। घरेलू जिम्मेदारियां बांटना, आराम का अवसर देना और महिला की इच्छा का सम्मान करना भी साथ निभाने का व्यावहारिक रूप है। करवा चौथ की परंपराएं तभी अधिक अर्थपूर्ण बनती हैं, जब उनके साथ प्रेम, स्वेच्छा और परस्पर देखभाल का भाव जुड़ा रहे।

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