धर्म-अध्यात्म

सर्वपितृ अमावस्या पर किन पूर्वजों का होता है श्राद्ध? जानें धार्मिक महत्व

nidhi
8 Oct 2026 8:33 AM IST
सर्वपितृ अमावस्या पर किन पूर्वजों का होता है श्राद्ध? जानें धार्मिक महत्व
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सर्वपितृ अमावस्या
जम्मू: हिंदू धर्म में पितृ पक्ष का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। इस दौरान लोग अपने दिवंगत पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पितृ पक्ष में किए गए इन कार्यों से पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और सम्मान प्रकट किया जाता है। लेकिन कई परिवारों को अपने पूर्वजों की मृत्यु की सही तिथि याद नहीं होती। ऐसे लोगों के लिए सर्वपितृ अमावस्या का दिन विशेष महत्वपूर्ण माना गया है।
वर्ष 2026 में सर्वपितृ अमावस्या शनिवार, 10 अक्टूबर को मनाई जाएगी। इसी दिन पितृ पक्ष का समापन होगा। इसे महालय अमावस्या और पितृ विसर्जनी अमावस्या भी कहा जाता है। धार्मिक परंपरा के अनुसार, इस दिन उन पूर्वजों का श्राद्ध किया जा सकता है, जिनकी मृत्यु की तिथि ज्ञात नहीं है या जिनका श्राद्ध किसी कारणवश निर्धारित तिथि पर नहीं हो पाया। ज्योतिष और धार्मिक परंपराओं के जानकारों के अनुसार, पितृ पक्ष में सामान्यतः पूर्वज की मृत्यु की चंद्र तिथि के अनुसार श्राद्ध किया जाता है। हालांकि, कई बार परिवार के लोगों को यह जानकारी नहीं होती कि उनके माता-पिता, दादा-दादी या अन्य पूर्वजों का निधन किस तिथि को हुआ था। ऐसी स्थिति में सर्वपितृ अमावस्या पर उनका सामूहिक श्राद्ध करने की परंपरा है।
धार्मिक मान्यता है कि इस दिन श्रद्धापूर्वक तर्पण और पिंडदान करने से पितरों को तृप्ति मिलती है। इसे परिवार की सुख-शांति और पूर्वजों का आशीर्वाद प्राप्त करने से भी जोड़ा जाता है।
सर्वपितृ अमावस्या की तिथि और समय
पंचांग के अनुसार, अमावस्या तिथि 9 अक्टूबर 2026 को रात 9 बजकर 35 मिनट पर शुरू होगी और 10 अक्टूबर को रात 9 बजकर 19 मिनट पर समाप्त होगी। इसलिए सर्वपितृ अमावस्या का श्राद्ध 10 अक्टूबर को किया जाएगा। श्राद्ध के लिए कुतुप, रौहिण और अपराह्न काल को महत्वपूर्ण माना जाता है। स्थानीय पंचांग के अनुसार मुहूर्त में अंतर हो सकता है।
कैसे करें श्राद्ध और तर्पण?
धार्मिक परंपरा के अनुसार, सर्वपितृ अमावस्या के दिन सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण किए जाते हैं। इसके बाद पूर्वजों का स्मरण करते हुए जल में काले तिल मिलाकर तर्पण किया जाता है। परिवार की परंपरा के अनुसार पिंडदान और श्राद्ध भी किया जा सकता है। कई परिवार इस अवसर पर ब्राह्मणों और जरूरतमंद लोगों को भोजन कराते हैं। इसके अलावा अन्न, वस्त्र और अन्य आवश्यक वस्तुओं का दान करने की भी परंपरा है। गाय, कौवे और कुत्ते को भोजन अर्पित करना भी पितृ पक्ष की धार्मिक परंपराओं में शामिल है।
पितरों की विदाई का दिन
सर्वपितृ अमावस्या को पितरों की विदाई का दिन माना जाता है। मान्यता है कि पितृ पक्ष के दौरान पूर्वज अपने वंशजों से तर्पण और श्रद्धा की अपेक्षा रखते हैं। अमावस्या के दिन अंतिम श्राद्ध करके उन्हें श्रद्धापूर्वक विदाई दी जाती है।
इस वर्ष सर्वपितृ अमावस्या शनिवार को पड़ रही है, इसलिए इसे शनिश्चरी अमावस्या भी कहा जा रहा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस अवसर पर दान-पुण्य और पूजा-अर्चना का विशेष महत्व है। धर्माचार्यों के अनुसार, श्राद्ध का मुख्य आधार श्रद्धा और पूर्वजों के प्रति सम्मान है। जिन परिवारों को मृत्यु तिथि की जानकारी नहीं है, वे अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार सर्वपितृ अमावस्या पर श्राद्ध कर सकते हैं।
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