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धर्म-अध्यात्म
हरतालिका तीज में बायना क्यों माना जाता है शुभ जानें इसके पीछे की मान्यता
nidhi
10 Sept 2026 1:36 PM IST

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सुहाग के सामान का क्या है महत्व
धर्म डेस्क: हरतालिका तीज सुहागिन महिलाओं के प्रमुख पर्वों में से एक है। इस दिन महिलाएं भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा कर सुखी वैवाहिक जीवन और पति की लंबी आयु की कामना करती हैं। इस साल हरतालिका तीज 14 सितंबर 2026, सोमवार को मनाई जाएगी। भाद्रपद शुक्ल तृतीया 13 सितंबर सुबह 7:08 बजे शुरू होकर 14 सितंबर सुबह 7:06 बजे समाप्त होगी।
तीज से जुड़ी एक खास परंपरा मायके से आने वाले बायने या सिंधारे की है। अलग-अलग क्षेत्रों में इसका नाम और तरीका अलग हो सकता है, लेकिन इसके पीछे बेटी के प्रति मायके का प्रेम और आशीर्वाद प्रमुख भाव माना जाता है।
मायके से क्यों आता है बायना?
कई परिवारों में हरतालिका तीज से पहले विवाहित बेटी के लिए मायके से साड़ी, चूड़ियां, सिंदूर, बिंदी, मेहंदी, मिठाई और श्रृंगार की दूसरी चीजें भेजी जाती हैं। इसे कई जगह सिंधारा या बायना कहा जाता है। यह परंपरा केवल पूजा सामग्री देने तक सीमित नहीं है, बल्कि विवाह के बाद भी बेटी और मायके के रिश्ते को मजबूत बनाए रखने का प्रतीक मानी जाती है।
माता-पिता इन वस्तुओं के साथ बेटी के सुखी दांपत्य जीवन और सौभाग्य की कामना करते हैं।
साड़ी का क्या है महत्व?
तीज पर मायके से आने वाली साड़ी को नए वस्त्र, सम्मान और शुभता से जोड़कर देखा जाता है। कई महिलाएं मायके से मिली नई साड़ी पहनकर शिव-पार्वती की पूजा करती हैं। हालांकि यह अनिवार्य धार्मिक नियम नहीं, बल्कि परिवार और क्षेत्र के अनुसार निभाई जाने वाली परंपरा है।
सिंदूर और चूड़ियां क्यों भेजी जाती हैं?
हिंदू विवाह परंपराओं में सिंदूर को सुहाग का प्रतीक माना जाता है। इसी तरह चूड़ियां विवाहित महिला के श्रृंगार का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। तीज के मौके पर इन वस्तुओं को भेजना बेटी के अखंड सौभाग्य और खुशहाल वैवाहिक जीवन की मंगलकामना से जोड़ा जाता है।
मेहंदी, बिंदी और अन्य श्रृंगार सामग्री भी बायने में शामिल की जाती है। हरतालिका तीज पर सोलह श्रृंगार करने की परंपरा भी कई क्षेत्रों में प्रचलित है।
शिव-पार्वती से जुड़ा है तीज का पर्व
हरतालिका तीज की कथा माता पार्वती की भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए की गई तपस्या से जुड़ी है। इसी वजह से इस पर्व को दांपत्य प्रेम, समर्पण और अटूट संकल्प का प्रतीक माना जाता है।
हालांकि मायके से साड़ी-सिंदूर या पूरा सुहाग सामान आना हर जगह अनिवार्य नहीं है। बायने की सामग्री और रस्में क्षेत्र तथा पारिवारिक परंपराओं के अनुसार अलग-अलग हो सकती हैं। इसका मूल भाव बेटी के प्रति मायके का स्नेह, आशीर्वाद और त्योहार की खुशियां साझा करना है।
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