धर्म-अध्यात्म

जितिया व्रत में तोरई के पत्तों का इस्तेमाल क्यों होता है, जानें वजह

nidhi
2 Oct 2026 10:56 AM IST
जितिया व्रत में तोरई के पत्तों का इस्तेमाल क्यों होता है, जानें वजह
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जितिया व्रत में तोरई के पत्तों पर ही क्यों रखा जाता है भोग
जितिया व्रत यानी जीवित्पुत्रिका व्रत संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना से रखा जाने वाला कठिन व्रत है। बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश के कई हिस्सों में इस पर्व को विशेष श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। इस व्रत से कई पारंपरिक मान्यताएं जुड़ी हैं, जिनमें तोरई के पत्तों पर भोग रखने की परंपरा भी खास मानी जाती है।
जितिया पूजा में तोरई यानी तोरी के पत्तों का इस्तेमाल केवल भोजन परोसने के लिए नहीं किया जाता, बल्कि इसे धार्मिक प्रतीक के रूप में भी देखा जाता है। लोक मान्यता के अनुसार तोरई की बेल तेजी से फैलती है और उसमें लगातार नए फल और पत्ते आते रहते हैं। इसी कारण इसे वंश वृद्धि, संतान की उन्नति और परिवार की निरंतरता से जोड़कर देखा जाता है।
व्रती महिलाएं पूजा के दौरान भगवान जीमूतवाहन और पितरों को भोग अर्पित करती हैं। कई क्षेत्रों में यह भोग तोरई के पत्ते पर रखा जाता है। मान्यता है कि हरे पत्ते पर भोग रखने से प्रकृति, उर्वरता और जीवन की निरंतरता का प्रतीकात्मक सम्मान होता है।
तोरई के पत्ते का एक संबंध स्थानीय और पारंपरिक भोजन व्यवस्था से भी माना जाता है। पुराने समय में ग्रामीण क्षेत्रों में पूजा-पाठ के दौरान प्राकृतिक पत्तों का उपयोग पात्र के रूप में किया जाता था। इससे पूजा में शुद्धता और प्रकृति से जुड़ाव का भाव बना रहता था।
जितिया व्रत की परंपराओं में अलग-अलग इलाकों के अनुसार कुछ अंतर भी देखने को मिलता है। कहीं तोरई के पत्तों पर भोग रखा जाता है तो कहीं दूसरी स्थानीय पत्तियों या पात्रों का इस्तेमाल किया जाता है। इसलिए इसे पूरे देश में एक समान अनिवार्य नियम नहीं माना जाता।
इस व्रत में माताएं निर्जला उपवास रखकर अपनी संतान की लंबी उम्र की कामना करती हैं। पूजा के दौरान भगवान जीमूतवाहन की कथा सुनने और विशेष प्रसाद अर्पित करने की परंपरा है। कई परिवारों में तोरई, नोनी साग और दूसरे पारंपरिक खाद्य पदार्थ भी इस पर्व का हिस्सा होते हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार तोरई की बेल का तेजी से बढ़ना और लगातार फल देना शुभ माना जाता है। इसलिए इसे संतान की वृद्धि, परिवार की समृद्धि और जीवन की निरंतरता का प्रतीक माना गया है। इसी भाव के कारण जितिया व्रत में तोरई के पत्तों को विशेष स्थान मिला है।
हालांकि यह मान्यता मुख्य रूप से लोक परंपरा और धार्मिक आस्था पर आधारित है। विभिन्न क्षेत्रों में इसकी व्याख्या अलग हो सकती है। फिर भी जितिया व्रत में तोरई के पत्ते पर भोग रखने की परंपरा आज भी कई परिवारों में श्रद्धा के साथ निभाई जाती है।
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