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धर्म-अध्यात्म
मांगलिक दोष में क्यों कराया जाता है पेड़ से विवाह जानें धार्मिक मान्यता
nidhi
17 Aug 2026 11:09 AM IST

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अश्वत्थ विवाह क्या है जानें मांगलिक दोष से इसका संबंध
नई दिल्ली: हिंदू विवाह परंपराओं में कुंडली मिलान को काफी महत्व दिया जाता है। ज्योतिष मान्यताओं के अनुसार यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में मांगलिक दोष होता है तो विवाह से पहले इसके निवारण के लिए कई उपाय बताए जाते हैं। इन्हीं उपायों में एक है अश्वत्थ विवाह, जिसमें व्यक्ति का प्रतीकात्मक विवाह पीपल के पेड़ से कराया जाता है। मान्यता है कि इससे मंगल दोष का प्रभाव कम होता है और वैवाहिक जीवन में आने वाली बाधाओं को दूर करने में सहायता मिलती है।
हालांकि यह ध्यान रखना जरूरी है कि मांगलिक दोष और उसके उपाय धार्मिक एवं ज्योतिषीय मान्यताओं पर आधारित हैं। वैज्ञानिक दृष्टि से इन मान्यताओं का कोई प्रमाण स्थापित नहीं है। कई लोग इन्हें आस्था और परंपरा के रूप में अपनाते हैं।
क्या होता है मांगलिक दोष?
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जब जन्म कुंडली में मंगल ग्रह कुछ विशेष भावों में स्थित होता है तो उसे मांगलिक दोष कहा जाता है। आमतौर पर लग्न से प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम या द्वादश भाव में मंगल होने पर मांगलिक दोष माना जाता है। हालांकि अलग-अलग ज्योतिष परंपराओं में इसकी गणना के तरीके अलग हो सकते हैं। मान्यता है कि मंगल ग्रह ऊर्जा, साहस और अग्नि तत्व का प्रतिनिधित्व करता है। यदि मंगल अशुभ स्थिति में हो तो विवाह में देरी, वैवाहिक मतभेद या रिश्तों में तनाव जैसी समस्याओं की आशंका जताई जाती है। इसी कारण कुछ परिवार विवाह से पहले दोष शांति के उपाय करवाते हैं।
अश्वत्थ विवाह क्या है?
अश्वत्थ विवाह का अर्थ है पीपल के वृक्ष के साथ प्रतीकात्मक विवाह करना। हिंदू परंपरा में पीपल के पेड़ को पवित्र माना गया है और इसे धार्मिक दृष्टि से विशेष महत्व दिया जाता है। इसी कारण मांगलिक दोष के निवारण के लिए पीपल वृक्ष से विवाह की परंपरा कई स्थानों पर प्रचलित है। मान्यता के अनुसार पहले प्रतीकात्मक विवाह कराकर मंगल दोष का प्रभाव उस विवाह पर स्थानांतरित कर दिया जाता है और इसके बाद वास्तविक विवाह किया जाता है। इसे एक धार्मिक उपाय के रूप में देखा जाता है।
पेड़ से विवाह क्यों किया जाता है?
ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार मांगलिक दोष में मंगल ग्रह के संभावित नकारात्मक प्रभाव को कम करने के लिए यह उपाय किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि जब व्यक्ति पहले एक प्रतीकात्मक विवाह कर लेता है तो उसके बाद होने वाले वास्तविक विवाह में मंगल दोष का प्रभाव कम हो जाता है।
कुछ मान्यताओं में इसे ऊर्जा संतुलन और ग्रहों के प्रभाव को शांत करने की प्रक्रिया के रूप में भी बताया जाता है। हालांकि यह धार्मिक विश्वास का विषय है और हर व्यक्ति इन मान्यताओं को अलग-अलग तरीके से देख सकता है।
अश्वत्थ विवाह की विधि
अश्वत्थ विवाह की विधि अलग-अलग क्षेत्रों और परंपराओं के अनुसार बदल सकती है। सामान्य रूप से इसमें:
शुभ मुहूर्त का चयन किया जाता है।
पीपल के पेड़ की पूजा की जाती है।
पेड़ को वस्त्र, फूल, रोली, अक्षत आदि अर्पित किए जाते हैं।
मंत्रोच्चार के साथ विवाह की रस्में पूरी की जाती हैं।
इसके बाद व्यक्ति का वास्तविक विवाह कराया जाता है।
कुछ परंपराओं में पीपल के पौधे का उपयोग भी किया जाता है।
क्या केवल पेड़ से विवाह करने से दोष समाप्त हो जाता है?
ज्योतिषीय मान्यताओं में इसे मंगल दोष शांति का एक उपाय माना जाता है, लेकिन कई विद्वान यह भी कहते हैं कि केवल एक दोष देखकर विवाह का निर्णय नहीं लेना चाहिए। पूरी कुंडली, ग्रहों की स्थिति और अन्य योगों को भी देखा जाता है।
कई ज्योतिष परंपराओं में मंगल की स्थिति, उस पर पड़ने वाली दृष्टि, सप्तम भाव, शुक्र और गुरु की स्थिति जैसे कई पहलुओं का अध्ययन किया जाता है।
मांगलिक दोष के अन्य उपाय
मांगलिक दोष के लिए अश्वत्थ विवाह के अलावा भी कई उपाय बताए जाते हैं। इनमें:
हनुमान जी की पूजा
मंगल मंत्र का जाप
मंगलवार का व्रत
कुंभ विवाह
विष्णु प्रतिमा विवाह
जैसे उपाय शामिल हैं। हालांकि इनकी मान्यता भी धार्मिक परंपराओं पर आधारित है।
विवाह में कुंडली मिलान की भूमिका
भारतीय समाज में कई परिवार विवाह से पहले कुंडली मिलान करवाते हैं। इसमें गुण मिलान, ग्रहों की स्थिति और वैवाहिक जीवन से जुड़े योग देखे जाते हैं। लेकिन आज के समय में कई लोग विवाह के निर्णय में आपसी समझ, विचारों की समानता, सम्मान और व्यवहार को भी उतना ही महत्व देते हैं। मांगलिक दोष को लेकर समाज में कई तरह की धारणाएं हैं। कुछ लोग इसे गंभीर मानते हैं, जबकि कुछ लोग इसे केवल एक ज्योतिषीय मान्यता मानते हैं। इसलिए किसी भी निर्णय से पहले संतुलित दृष्टिकोण रखना जरूरी है।
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