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नवरात्र नौ दिनों का, दुर्गा पूजा के पांच दिन क्यों खास?
शारदीय नवरात्र के बीच मां दुर्गा की आराधना के प्रमुख उत्सव दुर्गा पूजा की शुरुआत होने वाली है। बंगाल की परंपरा के अनुसार, वर्ष 2026 में मुख्य दुर्गा पूजा उत्सव 17 अक्टूबर को महाषष्ठी से शुरू होकर 21 अक्टूबर को विजयादशमी तक चलेगा। इन दिनों देवी के बोधन, सप्तमी पूजा, महाअष्टमी, महानवमी और प्रतिमा विसर्जन के अनुष्ठान होंगे। दुर्गा पूजा और शारदीय नवरात्र दोनों देवी उपासना से जुड़े हैं, लेकिन इनके आयोजन और पूजा की परंपराओं में अंतर है।
कोलकाता के पूजा कैलेंडर के अनुसार, 16 अक्टूबर को बिल्व निमंत्रण का अनुष्ठान होगा। इसके अगले दिन, 17 अक्टूबर को कल्पारंभ, अकाल बोधन, आमंत्रण और अधिवास किए जाएंगे। इसलिए मुख्य पांच दिनों के उत्सव की शुरुआत 17 अक्टूबर से मानी जा रही है, जबकि उससे जुड़े प्रारंभिक अनुष्ठान एक दिन पहले शुरू हो जाएंगे। बोधन का संबंध देवी के आवाहन से है और बंगाली दुर्गा पूजा में इसकी विशेष भूमिका है।
18 अक्टूबर को महासप्तमी और नवपत्रिका पूजा होगी। 19 अक्टूबर को महाअष्टमी, कुमारी पूजा और संधि पूजा के अनुष्ठान होंगे। बंगाली परंपरा की महानवमी 20 अक्टूबर को और विजयादशमी 21 अक्टूबर को मनाई जाएगी। दशमी पर प्रतिमा विसर्जन और सिंदूर उत्सव होगा। अन्य क्षेत्रों के दशहरा कैलेंडर में विजयादशमी 20 अक्टूबर को दर्ज है; बंगाली दुर्गा पूजा की दशमी 21 अक्टूबर को है। इस कारण उत्सव की तारीख देखते समय संबंधित क्षेत्र और पूजा परंपरा का ध्यान रखना आवश्यक है।
शारदीय नवरात्र का धार्मिक क्रम आश्विन महीने के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तक चलता है। इसमें नौ रातों के दौरान देवी की आराधना की जाती है। उत्तर भारत की प्रचलित परंपरा में शैलपुत्री से सिद्धिदात्री तक नवदुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा होती है। घटस्थापना, व्रत, दुर्गा सप्तशती का पाठ और अष्टमी या नवमी पर कन्या पूजन इसके प्रमुख अंग हैं। वर्ष 2026 में शारदीय नवरात्र की शुरुआत 11 अक्टूबर से हुई है।
दुर्गा पूजा में मुख्य सामूहिक उत्सव षष्ठी, सप्तमी, अष्टमी, नवमी और दशमी पर केंद्रित रहता है। इसी वजह से इसे आम तौर पर पांच दिनों का उत्सव कहा जाता है। हालांकि, इसकी तैयारियां और कुछ धार्मिक अनुष्ठान पहले से शुरू हो जाते हैं। पांच दिन कहने का अर्थ यह नहीं है कि देवी की आराधना या उत्सव से जुड़ी सभी गतिविधियां केवल इसी अवधि में होती हैं।
दोनों परंपराओं का आधार शक्ति की उपासना है। दुर्गा सप्तशती में वर्णित देवी और महिषासुर के युद्ध की कथा का भी दोनों में महत्व है। अंतर मुख्य रूप से पूजा के क्रम, क्षेत्रीय रीति-रिवाजों और उत्सव की अभिव्यक्ति में दिखाई देता है। नवरात्र में नौ स्वरूपों की दैनिक आराधना प्रमुख है, जबकि बंगाली दुर्गा पूजा में बोधन से देवी की विदाई तक का अनुष्ठानिक क्रम विशेष स्थान रखता है।
दुर्गा पूजा का एक व्यापक सांस्कृतिक पक्ष भी है। सार्वजनिक पंडाल, देवी की प्रतिमाएं और सामूहिक भागीदारी इस उत्सव की पहचान हैं। प्रतिमा निर्माण और पंडाल सजावट में कलाकारों तथा कारीगरों का योगदान रहता है। पूजा के दौरान लोग देवी के दर्शन के साथ इन कलात्मक प्रस्तुतियों को भी देखते हैं।
कोलकाता की दुर्गा पूजा को वर्ष 2021 में यूनेस्को की मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में शामिल किया गया था। यह मान्यता उत्सव से जुड़े धार्मिक, सामाजिक और कलात्मक स्वरूप को रेखांकित करती है। इस तरह दुर्गा पूजा देवी आराधना के साथ सामुदायिक सहभागिता और सांस्कृतिक परंपराओं का भी अवसर है। इस वर्ष बंगाली परंपरा के मुख्य उत्सव में शामिल होने के लिए 17 से 21 अक्टूबर का क्रम महत्वपूर्ण रहेगा।
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