धर्म-अध्यात्म

Diwali Special: हाथी-घोड़े वाली मिठाई की परंपरा, जानें दिलचस्प कहानी

Rajeshwari Nishad
29 Oct 2026 3:26 PM IST
Diwali Special: हाथी-घोड़े वाली मिठाई की परंपरा, जानें दिलचस्प कहानी
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जालौर। राजस्थान के जालौर जिले में दिवाली के त्योहार को लेकर बाजारों में रौनक बढ़ने लगी है। दीपावली पर लक्ष्मी-गणेश पूजन के लिए इस्तेमाल होने वाले पारंपरिक चीनी के बताशे और खिलौने इस बार आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। खास बात यह है कि सामान्य गोल बताशों के अलावा महल, मालिया, हाथी, कलश और दीपक जैसी अनोखी आकृतियों में तैयार चीनी की मिठाइयां लोगों का ध्यान खींच रही हैं। इन पारंपरिक आकृतियों को स्थानीय संस्कृति और धार्मिक मान्यताओं से जोड़कर देखा जाता है। दीपावली की पूजा में बताशों को शुभता, मिठास और खुशहाली का प्रतीक माना जाता है। यही कारण है कि आधुनिक मिठाइयों और आकर्षक गिफ्ट पैक के दौर में भी इन पारंपरिक बताशों का महत्व बना हुआ है।
महल, हाथी और कलश के आकार में तैयार हो रहे बताशे
जालौर के बाजारों में दिवाली के लिए चीनी से तैयार किए जाने वाले पारंपरिक बताशों की अलग पहचान है। सामान्य बताशों के साथ ही विभिन्न आकृतियों में तैयार मिठाइयां भी पूजा सामग्री के रूप में खरीदी जाती हैं।इनमें महल, मालिया, हाथी, कलश और दीपक जैसी आकृतियां विशेष रूप से आकर्षित करती हैं। सफेद चीनी से तैयार इन मिठाइयों को देखकर बच्चे भी उत्साहित होते हैं।स्थानीय परंपराओं में अलग-अलग आकृतियों का अपना सांकेतिक महत्व माना जाता है। हाथी को शुभता और वैभव, कलश को मंगल तथा दीपक को प्रकाश और सकारात्मकता से जोड़ा जाता है।हालांकि, इन आकृतियों से जुड़ी मान्यताएं परिवार और क्षेत्र के अनुसार अलग-अलग हो सकती हैं।
लक्ष्मी-गणेश पूजन में बताशों का विशेष महत्व
हिंदू धार्मिक परंपराओं में दीपावली की रात माता लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा करने का विशेष महत्व है।इस दौरान श्रद्धालु फूल, फल, मिठाई, खील, बताशे और अन्य पूजन सामग्री अर्पित करते हैं।धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, बताशों की मिठास जीवन में प्रेम, सुख-शांति और खुशहाली का प्रतीक मानी जाती है। वहीं, खील को कृषि और अन्न-समृद्धि से जोड़कर देखा जाता है।राजस्थान सहित उत्तर भारत के अनेक क्षेत्रों में खील-बताशे दिवाली पूजा की पारंपरिक सामग्री का हिस्सा हैं।पूजा के बाद इन्हें परिवार के सदस्यों, बच्चों और परिचितों में प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है।
कैसे तैयार किए जाते हैं पारंपरिक चीनी के खिलौने?
चीनी से बनने वाले पारंपरिक बताशों और खिलौनों को तैयार करना एक विशेष कारीगरी है।सामान्य तौर पर इन्हें बनाने के लिए चीनी को पानी के साथ गर्म करके गाढ़ी चाशनी तैयार की जाती है। इसके बाद निर्धारित तापमान और गाढ़ेपन पर चाशनी को विशेष सांचों में डाला जाता है।सांचों की सहायता से हाथी, घोड़ा, महल, कलश और अन्य आकृतियां तैयार की जाती हैं।ठंडा होने पर चीनी जम जाती है और उसे सावधानीपूर्वक सांचे से बाहर निकाला जाता है।इस काम में चाशनी का सही तापमान और समय महत्वपूर्ण होता है। थोड़ी सी लापरवाही से आकृतियां टूट सकती हैं या उनका आकार बिगड़ सकता है।यही कारण है कि इन पारंपरिक मिठाइयों को तैयार करने में अनुभव और सावधानी की जरूरत होती है।
पीढ़ियों से चली आ रही है यह परंपरा
राजस्थान में दिवाली के अवसर पर चीनी के खिलौने और बताशे खरीदने की परंपरा पुरानी है।पहले के समय में परिवार दिवाली से पहले बाजारों से खील, बताशे, मिट्टी के दीये और चीनी से बने खिलौने खरीदते थे।बच्चों के लिए ये मिठाइयां केवल खाने की चीज नहीं, बल्कि त्योहार की खुशियों का हिस्सा भी होती थीं।समय के साथ बाजारों में चॉकलेट, पैक्ड मिठाई और आधुनिक उपहारों का चलन बढ़ा है। इसके बावजूद कई परिवार आज भी पारंपरिक खील-बताशे खरीदना पसंद करते हैं।इस परंपरा को बनाए रखने में स्थानीय हलवाइयों और कारीगरों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
दिवाली पर बढ़ जाती है पूजा सामग्री की मांग
दीपावली का त्योहार नजदीक आते ही बाजारों में पूजा सामग्री की खरीदारी बढ़ने लगती है।मिट्टी के दीये, गणेश-लक्ष्मी की मूर्तियां, कलश, फूल-मालाएं, रोली, अक्षत और मिठाइयों के साथ खील-बताशों की भी मांग रहती है।जालौर में पारंपरिक आकृतियों वाले चीनी के खिलौने इस खरीदारी का विशेष हिस्सा बन रहे हैं।ग्राहक अपनी पारिवारिक परंपरा और आवश्यकता के अनुसार अलग-अलग आकार के बताशे खरीदते हैं।हालांकि, इस वर्ष इनकी कुल बिक्री, उत्पादन और कीमतों के आधिकारिक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए पिछले वर्षों की तुलना में बिक्री कितनी बढ़ी है, इसका निश्चित आकलन करना फिलहाल संभव नहीं है।
बच्चों के लिए भी खास आकर्षण
महल, हाथी, कलश और दीपक जैसी आकृतियों में बने चीनी के खिलौने बच्चों को भी आकर्षित करते हैं।रंग-बिरंगे पैकेटों और अलग-अलग आकृतियों में उपलब्ध ये पारंपरिक मिठाइयां त्योहार को विशेष बनाती हैं।कई परिवार बच्चों को इन खिलौनों के माध्यम से दीपावली की पुरानी परंपराओं के बारे में भी बताते हैं।इस तरह चीनी के पारंपरिक खिलौने केवल प्रसाद तक सीमित नहीं रहते, बल्कि नई पीढ़ी को स्थानीय संस्कृति से जोड़ने का माध्यम भी बनते हैं।
8 नवंबर को मनाई जाएगी दीपावली
इस वर्ष दीपावली का पर्व रविवार, 8 नवंबर 2026 को मनाया जाएगा। इसी दिन शाम को माता लक्ष्मी और भगवान गणेश की विशेष पूजा की जाएगी।जालौर के लिए द्रिक पंचांग के अनुसार, लक्ष्मी पूजन का शुभ मुहूर्त शाम 6 बजकर 18 मिनट से रात 8 बजकर 15 मिनट तक रहेगा।अमावस्या तिथि 8 नवंबर को सुबह 11 बजकर 27 मिनट से प्रारंभ होकर 9 नवंबर को दोपहर 12 बजकर 31 मिनट तक रहेगी।धार्मिक परंपरा के अनुसार, दीपावली की शाम घरों और प्रतिष्ठानों में दीपक जलाकर माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है।स्थानीय कारीगरों की आजीविका से भी जुड़ी है परंपरा
चीनी से बनने वाले बताशे और पारंपरिक खिलौने स्थानीय कारीगरों की आजीविका का भी हिस्सा हैं।त्योहारी सीजन में इस तरह की मिठाइयों का निर्माण छोटे कारोबारियों और पारंपरिक हलवाइयों को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराता है।
हालांकि, आधुनिक पैक्ड मिठाइयों और बदलती ग्राहक पसंद के कारण पारंपरिक उत्पादों को प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है।ऐसे में स्थानीय स्तर पर बने उत्पादों की खरीदारी कारीगरों को अपनी कला और व्यवसाय बनाए रखने में सहायता कर सकती है।
आधुनिक मिठाइयों के बीच कायम है बताशों की पहचान
आज दिवाली पर महंगी मिठाइयों, ड्राई फ्रूट्स और चॉकलेट गिफ्ट बॉक्स का चलन काफी बढ़ गया है। इसके बावजूद खील-बताशों का स्थान कई परिवारों की पूजा परंपरा में बना हुआ है।विशेष रूप से चीनी से बने हाथी, महल और कलश जैसी आकृतियां इस परंपरा को अनोखी पहचान देती हैं।
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