- Home
- /
- अन्य खबरें
- /
- धर्म-अध्यात्म
- /
- आज तीन व्रतों का...

x
तीन बड़े व्रत बना खास संयोग
धर्म डेस्क: आज का दिन धार्मिक दृष्टि से विशेष माना जा रहा है। इस बार एक ही दिन कजरी तीज, बहुला चौथ और संकष्टी चतुर्थी के व्रत का संयोग बताया जा रहा है। तीनों व्रतों का अपना अलग धार्मिक महत्व और पूजा परंपरा है। कजरी तीज में भगवान शिव और माता पार्वती, बहुला चौथ में भगवान श्रीकृष्ण और गौ माता तथा संकष्टी चतुर्थी में भगवान गणेश की आराधना का विशेष महत्व माना गया है।
कजरी तीज का महत्व
कजरी तीज मुख्य रूप से विवाहित महिलाओं द्वारा रखा जाने वाला व्रत है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार महिलाएं पति की लंबी आयु, वैवाहिक जीवन में सुख-शांति और अखंड सौभाग्य की कामना से यह व्रत करती हैं। इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा की जाती है।
कई स्थानों पर महिलाएं दिनभर उपवास रखने के बाद शाम को पूजा करती हैं और चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत पूर्ण करती हैं। इस पर्व पर श्रृंगार, मेहंदी और कजरी गीतों की भी विशेष परंपरा है।
बहुला चौथ पर गौ पूजा का महत्व
बहुला चौथ का पर्व भगवान श्रीकृष्ण और गौ माता की पूजा से जुड़ा हुआ माना जाता है। इस दिन महिलाएं संतान की सुख-समृद्धि और दीर्घायु की कामना से व्रत रखती हैं। धार्मिक परंपराओं के अनुसार गाय और बछड़े की पूजा करने का विशेष महत्व है।
मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक बहुला चौथ का व्रत करने और गौ माता की पूजा करने से परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है। कई क्षेत्रों में इस दिन दूध और दूध से बनी वस्तुओं के सेवन से परहेज करने की परंपरा भी है। पूजा की विधि क्षेत्र और पारिवारिक परंपराओं के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।
संकष्टी चतुर्थी पर गणपति की आराधना
संकष्टी चतुर्थी भगवान गणेश को समर्पित व्रत है। भगवान गणेश को विघ्नहर्ता और बुद्धि-सिद्धि का देवता माना जाता है। श्रद्धालु जीवन की परेशानियों से मुक्ति और मनोकामना पूरी होने की कामना से इस दिन गणपति की पूजा करते हैं।
व्रत रखने वाले श्रद्धालु भगवान गणेश को दूर्वा, फूल और मोदक या अन्य भोग अर्पित करते हैं। संकष्टी चतुर्थी के व्रत में चंद्र दर्शन का भी विशेष महत्व माना जाता है। कई परंपराओं में रात को चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद व्रत खोला जाता है।
तीन व्रतों के संयोग से बढ़ा महत्व
कजरी तीज, बहुला चौथ और संकष्टी चतुर्थी का एक ही दिन संयोग होने के कारण श्रद्धालुओं के लिए यह अवसर विशेष माना जा रहा है। तीनों व्रत परिवार की खुशहाली, संतान के कल्याण, वैवाहिक सुख और विघ्नों से मुक्ति जैसी अलग-अलग धार्मिक कामनाओं से जुड़े हैं।
श्रद्धालु अपनी पारिवारिक परंपरा और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार व्रत और पूजा कर सकते हैं। तिथि और पूजा के समय में स्थान के अनुसार अंतर संभव है, इसलिए स्थानीय पंचांग के अनुसार पूजा का समय देखना उचित रहेगा।
Next Story





