धर्म-अध्यात्म

Dev Uthani Ekadashi : 14 नवंबर से शुरू है देवउठनी एकादशी, जानें शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

Rani Sahu
8 Nov 2021 6:05 PM GMT
Dev Uthani Ekadashi : 14 नवंबर से शुरू है देवउठनी एकादशी, जानें शुभ मुहूर्त और पूजा विधि
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पंचांग के अनुसार कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी की तिथि को देवउठनी एकादशी होती है

पंचांग के अनुसार कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी की तिथि को देवउठनी एकादशी होती है. देवउठनी एकादशी को लोग सुख और समृद्ध जीवन के लिए भगवान विष्णु से प्रार्थना करते हैं. इस दिन भक्त दिन भर उपवास रखते हैं. ये दिन भगवान विष्णु को समर्पित है. देव उठनी एकादशी को विवाह के लिए भी शुभ माना जाता है.

उत्तर भारत के राज्यों में कई भक्त तुलसी विवाह या भगवान शालिग्राम और पवित्र तुलसी के पौधे का विवाह करते हैं. इस दिन मंदिरों की सजावट की जाती है. इस साल देवउठनी एकादशी 14 नवंबर, रविवार को मनाई जाएगी. आइए जानें इस दिन का महत्व क्या है.
देव उठानी एकादशी शुभ मुहूर्त
एकादशी तिथि 14 नवंबर 2021 – सुबह 05:48 बजे शुरू होगी
एकादशी तिथि 15 नवंबर 2021 – सुबह 06:39 बजे खत्‍म होगी
चातुर्मास मास का समापन
देवउठनी एकादशी यानी 14 नवंबर 2021 को चातुर्मास समाप्त होगा. ऐसा माना जाता है कि चतुर्मास के दौरान भगवान विष्णु आराम करते हैं. इस साल 20 जुलाई 2021 से चातुर्मास की शुरुआत हुई थी. पंचांग के अनुसार इस दौरान कोई भी शुभ और मांगलिक काम नहीं किए जाते हैं.
देवउठना एकादशी का महत्व
इस एकादशी तिथि के साथ, चतुर्मास अवधि, जिसमें श्रावण, भाद्रपद, अश्विन और कार्तिक महीने शामिल हैं, समाप्त हो जाती है. ऐसा माना जाता है कि भगवान विष्णु शयनी एकादशी को सोते हैं और इस दिन जागते हैं. इस प्रकार, इसे देवउठना या प्रबोधिनी कहा जाता है.
इस दिन भक्त सुबह जल्दी उठ जाते हैं, स्वच्छ वस्त्र पहन लेते हैं, भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी की उपवास पूजा करते हैं. ऐसा माना जाता है कि भगवान विष्णु के नौवें अवतार भगवान कृष्ण ने एकादशी को देवी वृंदा (तुलसी) से विवाह किया था. पंचांग के अनुसार इस साल, तुलसी विवाह 14 नवंबर, 2021 को मनाया जाएगा. हालांकि ये अवसर भारत में शादियों के मौसम की शुरुआत का भी प्रतीक है.
पूजा विधि
इस दिन भगवान विष्णु को धूप, दीप, फूल, फल और अर्घ्य आदि अर्पित करें. मंत्रों का जाप करें.
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ गोविंद त्यज निद्रां जगत्पते।त्वयि सुप्ते जगन्नाथ जगत् सुप्तं भवेदिदम्।।
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ वाराह दंष्ट्रोद्धृतवसुंधरे।
हिरण्याक्षप्राणघातिन् त्रैलोक्ये मंगलं कुरु।।
इयं तु द्वादशी देव प्रबोधाय विनिर्मिता।
त्वयैव सर्वलोकानां हितार्थं शेषशायिना।।
इदं व्रतं मया देव कृतं प्रीत्यै तव प्रभो।
न्यूनं संपूर्णतां यातु त्वत्वप्रसादाज्जनार्दन।।
इसके बाद भगवान को तिलक लगाएं, फल अर्पित करें, नए वस्त्र अर्पित करें और मिष्ठान का भोग लगाएं.
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