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धर्म-अध्यात्म
संक्षिप्त तर्पण नियम: मुख्य तिथि या अमावस्या को करें पूर्वजों का स्मरण
Tara Tandi
11 Sept 2026 11:01 AM IST

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ज्योतिष न्यूज़: पितृ पक्ष को हिंदू धर्म में पितरों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने का विशेष समय माना जाता है। इस दौरान लोग अपने पूर्वजों के निमित्त श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान और ब्राह्मण भोजन जैसे कर्म करते हैं। हालांकि आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में नौकरी, ऑफिस की जिम्मेदारियों और दूसरी व्यस्तताओं के कारण हर व्यक्ति के लिए पितृ पक्ष के सभी दिनों में पूजा-पाठ और तर्पण करना संभव नहीं होता। ऐसे में अक्सर सवाल उठता है कि अगर 15 दिनों तक रोज तर्पण नहीं कर पाए तो क्या पितरों का श्राद्ध अधूरा माना जाएगा? क्या किसी एक दिन श्राद्ध करके पूरे पितृ पक्ष का धार्मिक कर्तव्य पूरा किया जा सकता है? शास्त्रीय परंपराओं में ऐसी परिस्थितियों के लिए अलग-अलग व्यवस्थाओं का उल्लेख मिलता है।
पितृ पक्ष में रोज तर्पण न कर पाएं तो क्या करें?
पितृ पक्ष हिंदू धर्म में पितरों को याद करने और उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का विशेष समय माना जाता है। इस दौरान श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान जैसे कर्म किए जाते हैं। हालांकि आज की व्यस्त जीवनशैली में नौकरी और ऑफिस की जिम्मेदारियों के कारण हर व्यक्ति के लिए पितृ पक्ष के सभी दिनों में धार्मिक अनुष्ठान करना संभव नहीं होता। ऐसे में सवाल उठता है कि अगर 15 दिनों तक रोज तर्पण न कर पाएं तो क्या करें? धार्मिक परंपराओं में श्राद्ध के लिए सबसे महत्वपूर्ण आधार पितर की मृत्यु तिथि को माना गया है। इसलिए हर व्यक्ति के लिए पूरे 15 दिन रोज श्राद्ध करना जरूरी नहीं माना जाता। यदि पितर की मृत्यु तिथि ज्ञात है, तो पितृ पक्ष में उसी तिथि के दिन श्राद्ध करने की परंपरा है।
मृत्यु तिथि पता हो तो उसी दिन करें श्राद्ध
यदि माता-पिता या किसी अन्य पितर की मृत्यु की तिथि मालूम है, तो पितृ पक्ष में उसी तिथि पर श्राद्ध करना प्रमुख माना जाता है। उदाहरण के लिए, यदि किसी पितर की मृत्यु कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि को हुई थी, तो पितृ पक्ष की सप्तमी तिथि को उनका श्राद्ध किया जा सकता है। इसलिए नौकरी के कारण हर दिन तर्पण नहीं कर पाने वाले व्यक्ति को अपने पितर की निर्धारित श्राद्ध तिथि पर समय निकालकर विधिपूर्वक कर्म करना चाहिए।
मृत्यु तिथि न मालूम हो तो सर्वपितृ अमावस्या महत्वपूर्ण
कई बार परिवार में पूर्वज की मृत्यु की सही तिथि उपलब्ध नहीं होती। ऐसी स्थिति में सर्वपितृ अमावस्या का विशेष महत्व माना जाता है। इसे महालया अमावस्या भी कहा जाता है। यह दिन उन पितरों के लिए भी श्राद्ध करने का अवसर माना जाता है जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है। यदि किसी कारण से निर्धारित तिथि पर श्राद्ध नहीं हो पाया हो, तो भी परिवार की परंपरा और आचार्य की सलाह के अनुसार इस दिन श्राद्ध किया जा सकता है।
सर्वपितृ अमावस्या कब है?
साल 2026 में सर्वपितृ अमावस्या 10 अक्तूबर, शनिवार को है। पितृ पक्ष का समापन इसी दिन माना जाएगा। ऐसे लोग जो नौकरी या दूसरी व्यस्तताओं के कारण पितृ पक्ष में नियमित तर्पण नहीं कर पाते, वे अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार इस दिन पितरों का तर्पण और श्राद्ध कर सकते हैं। हालांकि श्राद्ध की तिथि और मुहूर्त स्थान तथा पंचांग के अनुसार अलग हो सकते हैं, इसलिए अंतिम समय स्थानीय पंचांग से जरूर जांचना चाहिए।
क्या 15 दिन रोज तर्पण करना अनिवार्य है?
यह समझना जरूरी है कि दैनिक तर्पण और श्राद्ध तिथि पर किया जाने वाला श्राद्ध अलग धार्मिक कर्म हैं। इसलिए यदि कोई व्यक्ति रोज तर्पण नहीं कर सकता, तो इसका अर्थ यह नहीं कि उसका पितृ कर्म पूरी तरह छूट गया। शास्त्रीय परंपराओं में परिस्थितियों के अनुसार वैकल्पिक व्यवस्था का उल्लेख मिलता है। लेकिन परिवार की कुल-परंपरा, संप्रदाय और पितर की मृत्यु तिथि के अनुसार नियम बदल सकते हैं।
नौकरीपेशा लोग कैसे करें श्राद्ध?
अगर ऑफिस की व्यस्तता ज्यादा है तो पितृ पक्ष शुरू होने से पहले अपने पितर की श्राद्ध तिथि पता कर लें। उस दिन सुबह स्नान आदि के बाद अपनी परंपरा के अनुसार तर्पण और श्राद्ध करें। यदि मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है, तो सर्वपितृ अमावस्या का दिन चुना जा सकता है। श्राद्ध कर्म में विधि के साथ श्रद्धा और सम्मान की भावना को भी महत्वपूर्ण माना गया है। इसलिए व्यस्तता के कारण पूरे 15 दिन कर्म न कर पाने पर परेशान होने के बजाय उपलब्ध समय में उचित तिथि पर विधिपूर्वक श्राद्ध करना बेहतर है।
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