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धर्म-अध्यात्म
घंटी बजाने की परंपरा: जानें इसके पीछे की पौराणिक कहानी
Tara Tandi
6 July 2026 6:09 PM IST

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नई दिल्ली: भारत के लगभग हर मंदिर में प्रवेश द्वार पर एक बड़ी घंटी लगी होती है और ज्यादातर श्रद्धालु मंदिर में कदम रखते ही उसे जरूर बजाते हैं. कई लोग इसे केवल एक धार्मिक परंपरा मानते हैं, जबकि कुछ लोग इसे शुभ शुरुआत का प्रतीक समझते हैं. दिलचस्प बात यह है कि घंटी बजाने की यह परंपरा केवल आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी जुड़े हुए बताए जाते हैं. हालांकि वैज्ञानिक कारणों को लेकर अलग-अलग मत हैं और इन पर शोध सीमित है, इसलिए इन्हें पारंपरिक मान्यताओं के रूप में ही समझना चाहिए. फिर भी यह परंपरा सदियों से लोगों के जीवन और पूजा-पद्धति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी हुई है.
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मंदिर की घंटी की ध्वनि भगवान के स्वागत का प्रतीक मानी जाती है. ऐसा विश्वास है कि जब श्रद्धालु घंटी बजाकर मंदिर में प्रवेश करता है, तो वह अपने मन को सांसारिक चिंताओं से हटाकर ईश्वर की भक्ति की ओर केंद्रित करता है. कई प्राचीन ग्रंथों में भी उल्लेख मिलता है कि पूजा की शुरुआत ध्वनि के साथ करना शुभ माना गया है. घंटी की गूंज को सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है, जो पूजा के वातावरण को पवित्र और शांत बनाने में सहायक मानी जाती है. यही कारण है कि आरती या विशेष पूजा के दौरान भी घंटी और शंख का उपयोग किया जाता है.
वैज्ञानिक दृष्टि से क्या कहा जाता है?
घंटी बजाने से निकलने वाली ध्वनि के बारे में यह माना जाता है कि उसकी गूंज कुछ क्षणों तक वातावरण में बनी रहती है. कुछ लोगों का मानना है कि इस ध्वनि पर ध्यान केंद्रित करने से मन भटकने की बजाय एकाग्र हो सकता है और व्यक्ति कुछ समय के लिए मानसिक रूप से शांत महसूस कर सकता है. हालांकि, यह दावा कि मंदिर की घंटी की विशेष ध्वनि सीधे शरीर या मस्तिष्क पर वैज्ञानिक रूप से सिद्ध प्रभाव डालती है, मजबूत वैज्ञानिक प्रमाणों से स्थापित नहीं है. इसलिए इसे एक पारंपरिक धारणा के रूप में ही देखना चाहिए. फिर भी ध्यान, संगीत और मधुर ध्वनियों का मानसिक शांति से संबंध कई अध्ययनों में देखा गया है, इसलिए घंटी की आवाज भी कुछ लोगों को ध्यान की अवस्था में आने में मददगार लग सकती है.
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