धर्म-अध्यात्म

आज रखा जा रहा अहोई अष्टमी व्रत जानें कब और कैसे करें पारण

nidhi
1 Nov 2026 11:03 AM IST
आज रखा जा रहा अहोई अष्टमी व्रत जानें कब और कैसे करें पारण
x

धर्म डेस्क : संतान की सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना से रखा जाने वाला अहोई अष्टमी व्रत आज रविवार, 1 नवंबर 2026 को है। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को माताएं अहोई माता की पूजा करती हैं। दिनभर उपवास रखने के बाद शाम को कथा सुनने और तारों को अर्घ्य देने की परंपरा है। कई परिवारों में तारों के दर्शन के बाद व्रत खोला जाता है, जबकि कुछ घरों में चंद्रमा के दर्शन की रीति निभाई जाती है। पूजा और पारण का क्रम क्षेत्र तथा पारिवारिक परंपरा के अनुसार अलग हो सकता है।

दृक पंचांग के अनुसार, अष्टमी तिथि आज दोपहर 2 बजकर 51 मिनट पर शुरू होगी और सोमवार, 2 नवंबर को दोपहर 1 बजकर 10 मिनट तक रहेगी। नई दिल्ली के लिए अहोई अष्टमी की पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 5 बजकर 36 मिनट से 6 बजकर 54 मिनट तक है। इस प्रकार पूजन के लिए एक घंटा 18 मिनट का समय मिलेगा। तिथि अगले दिन तक रहने के बावजूद व्रत आज रखा जा रहा है। श्रद्धालु ध्यान रखें कि यहां दिए गए पूजा और दर्शन के समय नई दिल्ली के लिए हैं। दूसरे शहरों में स्थानीय पंचांग के अनुसार अंतर संभव है।
नई दिल्ली में तारों के दर्शन का अनुमानित समय शाम 6 बजे बताया गया है। यह ऐसा निश्चित समय नहीं है, जब हर स्थान पर तारे दिखाई देना अनिवार्य हो। मौसम, बादलों और आसपास की रोशनी से उनकी दृश्यता प्रभावित हो सकती है। जिन परिवारों में चंद्रदर्शन के बाद पारण किया जाता है, उनके लिए नई दिल्ली में चंद्रोदय रात 11 बजकर 40 मिनट पर बताया गया है। इसलिए तारों को देखकर व्रत खोलने और चंद्रमा के दर्शन तक उपवास रखने की परंपराओं के बीच समय का बड़ा अंतर है।
अहोई अष्टमी की पूजा के लिए घर में स्वच्छ स्थान तैयार किया जाता है। कुछ परिवारों में दीवार पर गेरू से अहोई माता की आकृति बनाई जाती है, जबकि अन्य घरों में चित्र स्थापित कर पूजन होता है। माता के साथ स्याऊ अर्थात सेही और उसके बच्चों की आकृति बनाने की परंपरा भी प्रचलित है। पूजा में रोली, अक्षत, फूल और दीपक अर्पित किए जाते हैं। हलवा, पुए, पूरी या अन्य पारंपरिक पकवान का भोग लगाया जा सकता है। इसके बाद कथा पढ़ी या सुनी जाती है और परिवार की खुशहाली के लिए प्रार्थना की जाती है।
कुछ क्षेत्रों में पूजा के समय एक करवे में जल और दूसरे में अनाज रखा जाता है। जल का इस्तेमाल तारों को अर्घ्य देने के लिए किया जाता है। सास अथवा परिवार की बड़ी महिला के लिए बायना निकालने की रीति भी है। इसमें भोजन, वस्त्र और सुहाग की सामग्री रखी जा सकती है। हालांकि, पूजा सामग्री की सूची सभी परिवारों में एक जैसी नहीं होती। जिस घर में जो परंपरा चली आ रही हो, उसके अनुसार तैयारी की जाती है। अहोई माता की आकृति और पूजा के क्रम में भी स्थानीय विविधता दिखाई देती है।
अहोई अष्टमी की एक प्रचलित लोककथा में सात पुत्रों वाली एक महिला का वर्णन मिलता है। दीपावली से पहले घर की लिपाई के लिए वह मिट्टी लेने जाती है। मिट्टी खोदते समय अनजाने में उसकी कुदाल से सेही के बच्चों को नुकसान पहुंच जाता है। इस घटना से महिला दुखी होकर घर लौट आती है। कथा के अनुसार, बच्चों को खोने से व्यथित सेही श्राप देती है और महिला को भी संतान वियोग सहना पड़ता है। यहां वर्णित घटनाएं धार्मिक लोककथा का हिस्सा हैं, जिन्हें श्रद्धालु व्रत के अवसर पर सुनते हैं।
कथा आगे बताती है कि दुखी महिला को एक वृद्धा अहोई माता की पूजा और व्रत करने की सलाह देती है। वह पश्चाताप के साथ माता की आराधना करती है और जीवों का अहित नहीं करने का संकल्प लेती है। लोककथा के अनुसार, माता उसकी भक्ति से प्रसन्न होती हैं और उसके पुत्र सकुशल लौट आते हैं। इस कथा का संदेश करुणा, पश्चाताप और संतान के प्रति स्नेह से जुड़ा माना जाता है। अहोई की दूसरी कथाओं में साहूकार की छोटी बहू, सुरही गाय और सेही का प्रसंग आता है। कथा के संस्करण अलग-अलग क्षेत्रों में भिन्न हैं।
साहूकार की छोटी बहू वाली कथा में वह अपनी ननद के स्थान पर सेही का श्राप स्वीकार करती है। बाद में संतान वियोग का दुख झेलने पर उसे सुरही गाय की सेवा करने की सलाह मिलती है। गाय की सहायता से वह सेही तक पहुंचती है और सेवा-समर्पण से उसे प्रसन्न करती है। अंत में उसे संतान सुख का आशीर्वाद मिलता है। श्रद्धालु अपने परिवार में प्रचलित कथा का पाठ कर सकते हैं। इस पर्व से जुड़े चमत्कार धार्मिक मान्यता हैं; व्रत को संतान के स्वास्थ्य या सुरक्षा की सुनिश्चित गारंटी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
शाम को पूजा, कथा और परंपरा के अनुसार अर्घ्य देने के बाद प्रसाद ग्रहण कर व्रत का पारण किया जाता है। आज यह व्रत बेटे और बेटियों, दोनों की खुशहाली की कामना से रखा जाता है। उपवास का स्वरूप भी घरों के अनुसार अलग होता है। लंबे या निर्जला उपवास से पहले अपनी स्वास्थ्य स्थिति का ध्यान रखें। गर्भवती या स्तनपान कराने वाली महिलाओं तथा नियमित दवा लेने वालों को चिकित्सकीय सलाह के अनुसार निर्णय लेना चाहिए। पूजा का स्थानीय समय जानने के लिए अपने शहर का पंचांग देखें।

Next Story