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धर्म-अध्यात्म
यम के दीपक में डालें ये 2 चीजें, जानें खास धार्मिक मान्यता
nidhi
5 Nov 2026 9:32 AM IST
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यम के दीपक
धर्म डेस्क: हिंदू धर्म में धनतेरस का विशेष धार्मिक महत्व है। इस दिन भगवान धन्वंतरि, माता लक्ष्मी और कुबेर देवता की पूजा के साथ मृत्यु के देवता यमराज के नाम पर दीपदान करने की परंपरा भी है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, धनतेरस की शाम यमराज के निमित्त दीपक जलाने से परिवार में अकाल मृत्यु का भय दूर होने और सुख-शांति बनी रहने की कामना की जाती है। इस विशेष दीपदान को 'यम दीपदान' या 'यम दीपम' कहा जाता है। मान्यता है कि इस दिन केवल चौमुखी दीपक जलाना ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि उसमें उपयोग की जाने वाली सामग्री और दीपक रखने की दिशा का भी विशेष महत्व होता है।
साल 2026 में धनतेरस का पर्व 6 नवंबर, शुक्रवार को मनाया जाएगा। इस अवसर पर श्रद्धालु अपने घरों में दीपक जलाकर सुख-समृद्धि और परिवार के सदस्यों के अच्छे स्वास्थ्य की प्रार्थना करेंगे। धार्मिक परंपराओं के अनुसार, यम दीपक को सामान्य दीपक से अलग माना जाता है। इसे घर के मुख्य द्वार के बाहर दक्षिण दिशा की ओर रखने का विधान बताया गया है। यम दीपदान के दौरान मुख्य रूप से तिल का तेल और काले तिल इस्तेमाल करने की परंपरा भी प्रचलित है। कुछ परिवारों में सरसों के तेल का उपयोग किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं में तिल का संबंध पितरों और यमराज की पूजा से जोड़ा जाता है। इसलिए कई लोग यम दीपक में तिल का तेल भरकर उसमें थोड़े काले तिल डालते हैं। इसे परिवार की मंगलकामना और अनिष्ट से रक्षा की प्रार्थना का प्रतीक माना जाता है।
इसके अलावा कुछ लोक परंपराओं में यम दीपक में कौड़ी और सिक्का रखने का भी प्रचलन है। ऐसी मान्यता है कि ये वस्तुएं आर्थिक समृद्धि और शुभता का प्रतीक हैं। हालांकि, अलग-अलग क्षेत्रों में यम दीपदान की सामग्री और विधि में अंतर देखने को मिलता है। इसलिए श्रद्धालु अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार भी दीपदान कर सकते हैं। यम दीपक जलाने के लिए सबसे पहले मिट्टी या आटे का दीपक लिया जाता है। इसके बाद उसमें चार बत्तियां लगाई जाती हैं। कई परिवारों में दो लंबी बत्तियों को एक-दूसरे के ऊपर क्रॉस के आकार में रखकर चार मुख वाला दीपक तैयार किया जाता है। इसके बाद दीपक में तिल या सरसों का तेल डालकर उसे जलाया जाता है।
धार्मिक परंपरा के अनुसार, इस दीपक को सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल में जलाना शुभ माना जाता है। दीपक जलाने से पहले पूजा स्थल की सफाई की जाती है। इसके बाद यमराज का स्मरण करते हुए परिवार के सभी सदस्यों की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुरक्षा की प्रार्थना की जाती है। यम दीपदान में दिशा का भी विशेष महत्व बताया गया है। हिंदू धार्मिक मान्यताओं में दक्षिण दिशा को यमराज की दिशा माना जाता है। इसी कारण यम दीपक को घर के मुख्य द्वार के बाहर दक्षिण दिशा की ओर रखने की परंपरा है। कई स्थानों पर दीपक को गेहूं या अन्य अनाज की छोटी ढेरी पर रखा जाता है।
दीपदान के समय यमराज से जुड़ा मंत्र भी पढ़ा जाता है। प्रचलित मंत्र इस प्रकार है—
मृत्युना पाशदण्डाभ्यां कालेन श्यामया सह।
त्रयोदश्यां दीपदानात् सूर्यजः प्रीयतां मम॥
इस मंत्र के माध्यम से यमराज की कृपा और परिवार की मंगलकामना की प्रार्थना की जाती है। मान्यता है कि श्रद्धा और भक्ति के साथ किया गया यम दीपदान जीवन के प्रति कृतज्ञता और सुरक्षा की कामना व्यक्त करता है। यम दीपदान के पीछे एक प्रसिद्ध पौराणिक कथा भी प्रचलित है। कथा के अनुसार, राजा हिम के पुत्र की विवाह के चौथे दिन मृत्यु होने की भविष्यवाणी की गई थी। जब वह समय आया, तब उसकी पत्नी ने घर के प्रवेश द्वार पर दीपक जलाए और आभूषणों का ढेर लगा दिया। कथा में बताया जाता है कि दीपकों की रोशनी के कारण यमदूत अपना उद्देश्य पूरा नहीं कर सके। इसी धार्मिक कथा से धनतेरस पर यम दीपदान की परंपरा को जोड़ा जाता है।
धनतेरस पर कई परिवारों में घर के अलग-अलग स्थानों पर दीपक जलाने की भी परंपरा है। मुख्य प्रवेश द्वार, पूजा स्थल, तुलसी के पौधे के पास और अन्य स्थानों पर दीपक जलाकर सुख-समृद्धि की कामना की जाती है। हालांकि, यमराज के नाम पर जलाया जाने वाला दीपक विशेष रूप से परिवार की सुरक्षा और दीर्घायु की प्रार्थना से जुड़ा होता है। धार्मिक जानकारों के अनुसार, यम दीपदान करते समय श्रद्धा, स्वच्छता और पारिवारिक परंपराओं का ध्यान रखना चाहिए। दीपक ऐसी जगह रखना चाहिए जहां आग लगने का खतरा न हो। बच्चों और पालतू जानवरों की पहुंच से दूर सुरक्षित स्थान पर ही दीपक जलाना उचित है। इस तरह धनतेरस का यम दीपदान केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जीवन, स्वास्थ्य और परिवार की खुशहाली की कामना से जुड़ी परंपरा भी है। तिल का तेल और काले तिल इसके प्रचलित प्रतीकात्मक तत्व हैं। दीपक जलाने या उसमें कोई वस्तु डालने से अकाल मृत्यु निश्चित रूप से टलने का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इसे धार्मिक आस्था और लोकमान्यता के रूप में ही समझना चाहिए।
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