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सामान्य रक्त परीक्षण से भी पहचाना जा सकता है गर्भवती को है प्रीक्लेम्पसिया या नहीं: शोध

jantaserishta.com
20 Oct 2024 11:16 AM IST
सामान्य रक्त परीक्षण से भी पहचाना जा सकता है गर्भवती को है प्रीक्लेम्पसिया या नहीं: शोध
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नई दिल्ली: गर्भवती महिला को प्रीक्लेम्पसिया का रिस्क है या नहीं इसका पता एक सामान्य ब्लड टेस्ट से भी किया जा सकता है। एक शोध के आधार पर विशेषज्ञों ने ये बात कही है। प्रीक्लेम्पसिया गर्भावस्था में होने वाला हाइपरसेंसेटिव विकार है जो कभी-कभी जानलेवा भी हो सकता है।
रोग नियंत्रण और रोकथाम केंद्र (सीडीसी) के अनुसार, 5 से 10 प्रतिशत गर्भवती महिलाओं को प्रीक्लेम्पसिया (अचानक उच्च रक्तचाप और यूरिन में प्रोटीन) की शिकायत होती है। प्रीक्लेम्पसिया गर्भावस्था के 20वें सप्ताह में ही विकसित हो सकता है, अध्ययन में उन महिलाओं की पहचान करने पर ध्यान केंद्रित किया गया जो प्रसव के दौरान अस्पताल में भर्ती थीं और उन्हें प्रीक्लेम्पसिया का रिस्क था।
शोधकर्ताओं को विश्वास है कि डॉक्टर दो रक्त प्रोटीन - फाइब्रिनोजेन और एल्ब्यूमिन - के अनुपात की गणना कर एक महिला के प्रीक्लेम्पसिया रिस्क को लेकर भविष्यवाणी कर सकते हैं। प्रसव पूर्व जब महिला अस्पताल में एडमिट होती है तो इसे नियमित रक्त परीक्षण में मापा जाता है। फाइब्रिनोजेन एक प्रोटीन है जो रक्त के थक्के जमाने और सूजन के लिए जिम्मेदार होता है, जबकि एल्ब्यूमिन तरल पदार्थों का संतुलन बनाए रखने में मदद करता है और पूरे शरीर में हार्मोन, विटामिन और एंजाइम पहुंचाता है।
प्रीक्लेम्पसिया से दोनों ही बाधित हो सकते हैं - फाइब्रिनोजेन बढ़ सकता है, एल्ब्यूमिन कम हो सकता है, या दोनों ही स्थिति हो सकती है। फाइब्रिनोजेन-टू-एल्ब्यूमिन अनुपात (एफएआर) को लेकर कोई सार्वभौमिक स्थापित सामान्य मान नहीं है, जो 0.05 से 1 या उससे अधिक हो सकता है। उच्च एफएआर मान अक्सर बढ़े सूजन, संक्रमण या गंभीर स्वास्थ्य स्थितियों से जुड़े होता है, और एफएआर जितना अधिक होता है, चिंता उतनी ही अधिक होती है।
अध्ययन में, शोधकर्ताओं ने 2018 और 2024 के बीच जन्म देने वाली 2,629 महिलाओं, 1,819 जिन्हें प्रीक्लेम्पसिया नहीं था, 584 जिन्हें हल्के लक्षणों या लक्षणों के साथ प्रीक्लेम्पसिया था और 226 जिन्हें गंभीर लक्षणों या लक्षणों के साथ प्रीक्लेम्पसिया था, के रिकॉर्ड का विश्लेषण किया। शोधकर्ताओं ने पाया कि जिन लोगों का एफएआर अधिक था, उनमें कम एफएआर वाले लोगों की तुलना में प्रीक्लेम्पसिया विकसित होने की अधिक संभावना थी।
उनके शोध से स्पष्ट हुआ कि अस्पताल में भर्ती गर्भवती जिनका एफएआर स्तर 0.1 या उससे कम था उन्हें प्रीक्लेम्पसिया होने की 24 फीसदी आशंका थी। वहीं जब एफएआर स्तर 0.3 तक पहुंचा तो इस विकार की संभावना 41 फीसदी तक बढ़ गई।
यदि प्रसव पीड़ा से गुजर रही महिला को एफएआर और अन्य नैदानिक ​​संकेतकों - जैसे कि 35 वर्ष से अधिक उम्र या क्रोनिक उच्च रक्तचाप या मोटापा हो - तो प्रीक्लेम्पसिया का जोखिम बढ़ जाता है। ऐसे मामले में प्रसूति विशेषज्ञ और एनेस्थेसियोलॉजिस्ट रिस्क को कम करने के लिए अतिरिक्त सावधानी बरत सकते हैं और यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि रोगी का रक्तचाप और द्रव स्तर (फ्लूइड लेवल) स्थिर और नियंत्रित रहे।
इसमें सुझाव दिया गया कि " ऐसी स्थिति में रक्तचाप की जांच या प्रयोगशाला परीक्षण का आदेश दे सकते हैं। यदि एफएआर इंगित करता है कि महिला के लक्षण गंभीर हैं तो पहले ही दर्द से राहत दिलाने के लिए एक एपिड्यूरल ( दर्द निवारक इंजेक्शन) लगाया जा सकता है।"
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