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मनोरंजन

OTT प्लेटफॉर्म को ज्यादा पॉपुलर बना रही है ये फ़िल्में...फैंस को रिलीज़ का इंतजार...देखें पूरी लिस्ट

Janta se Rishta
28 Aug 2020 2:43 PM GMT
OTT प्लेटफॉर्म को ज्यादा पॉपुलर बना रही है ये फ़िल्में...फैंस को रिलीज़ का इंतजार...देखें पूरी लिस्ट
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Famous TT Platforms: 'खाली पीली', 'सड़क 2' और 'लक्ष्मी बम' जैसी फिल्में OTT को बना रही है और ज्यादा पॉपुलर

जनता से रिश्ता वेबडेस्क। कोरोना संक्रमण ने मनोरंजन की दुनिया में नए विकल्प पेश किए हैं। सिनेमाघर बंद होने की वजह से एक ओर जहां थिएटर के लिए बनी बड़े सितारों की फिल्में डिजिटल प्लेटफॉर्म पर रिलीज होने लगी हैं, वहींदूसरी ओर कई ऐसी फिल्में भी हैं जो कई साल से अटकी थीं, पर अब उन्हें भी डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए दर्शकों के बीच पहुंचने का मौका मिलने लगा है। ओटीटी की बढ़ती लोकप्रियता के बीच वहां पर फिल्मों की रिलीज को बिजनेस और कॅरियर के संदर्भ में किस नजरिए से देखते हैं फिल्मकार और सितारे, इसकी पड़ताल कर रही हैं स्मिता श्रीवास्तवl

कोरोना संकट की वजह से टीवी पर रिपीट होते धारावाहिक और बंद सिनेमाघरों ने उन लोगों का ध्यान डिजिटल प्लेटफॉर्म की ओर आकर्षित किया जो इससे मुखातिब नहीं थे। वहां पर देसी-विदेशी वेब सीरीज और फिल्मों के प्रचुर भंडार मनोरंजन के बेहतर विकल्प के तौर पर सामने आए। बड़े सितारों की फिल्में 'सड़क 2', 'भुज- द प्राइड ऑफ इंडिया', 'लक्ष्मी बॉम्ब', 'खाली पीली' भी अब यहां पर रिलीज हो रही हैं। इसके साथ ही उन फिल्मों की रिलीज के रास्ते भी बन गए जो पिछले कुछ अर्से से रिलीज का इंतजार कर रही थीं। पिछले साल पूजा भट्ट निर्मित और रिचा चड्ढा अभिनीत फिल्म 'कैबरे' करीब चार साल की देरी से डिजिटल प्लेटफॉर्म पर रिलीज हुई। अटकी फिल्मों की फेहरिस्त में शामिल 'घूमकेतु', 'यारा', 'भोंसले' लॉकडाउन के दौरान रिलीज हुईं। अब 'राम सिंह चार्ली' रिलीज हो रही है। ये सभी फिल्में तकरीबन चार से पांच साल पुरानी हैं।

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रिलीज में देरी का कितना असर:

फिल्म 'घूमकेतु' से निर्देशन में कदम रखने वाले पुष्पेंद्र नाथ मिश्रा कहते हैं, 'ये सच है कि फिल्म थोड़े समय बाद रिलीज होती है तो पुरानी दिखती है, क्योंकि वह तत्कालीन परिप्रेक्ष्य में निर्मित होती है। अब फिल्मों की रिलीज के लिए ओटीटी के तमाम विकल्प हैं। पुरानी फिल्में भी यहां पर जगह पा रही हैं। मेरा मानना है कि अगर कहानी दमदार है तो देरी से फर्क नहीं पड़ता। लोग उसे पसंद करते हैं। नेटफ्लिक्स पर रिलीज मेरी वेब सीरीज 'ताजमहल 1989' की कहानी वर्ष 1989 में सेट है, मगर वह दर्शकों के दिल तक पहुंचने में कामयाब रही। उनकी बातों से 'यारा' फिल्म के निर्देशक तिग्मांशु धूलिया भी सहमति जताते हैं। वह कहते हैं, 'मेरी कई फिल्मों की रिलीज के साथ समस्या आई है। मेरी पहली फिल्म 'हासिल' की रिलीज में भी काफी वक्त लग गया था। 'यारा' में थोड़ा ज्यादा वक्त लग गया। अगर डिजिटल प्लेटफॉर्म पहले होते तो शायद यह समस्या नहीं होती। अब अगर आपका काम अच्छा लगा तो पूरी दुनिया देख सकती है। इसके अपने फायदे भी हैं। शोज, थिएटर और मार्केटिंग का झंझट नहीं होता है।

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कई बातों पर निर्भर करते हैं फैसले:

फिल्म की रिलीज में देरी के कारणों के संदर्भ में ट्रेड एनालिस्ट अमूल मोहन कहते हैं, 'फिल्म निर्माण की एक लागत होती है और रिलीज करने की अलग। थिएटर में रिलीज की जाने वाली फिल्मों पर अतिरिक्त खर्च करना पड़ता है। निर्माता ही रिलीज का फैसला लेते हैं। जब फिल्म की लागत निकलने के आसार नहीं दिखते तो निर्माता अतिरिक्त खर्च के मूड में नहीं होते हैं। वे रिलीज को रोक लेते हैं। डिजिटल पर बॉक्स ऑफिस का दबाव नहीं है। लिहाजा अटकी फिल्में भी बाहर आ रही हैं।Ó फिल्में भले ही देरी से रिलीज हों, लेकिन उनमें काम करने वाले कलाकार अपने कॅरियर में आगे बढ़ चुके होते हैं। अटकी फिल्मों की रिलीज से उनके कॅरियर पर ज्यादा फर्क नहीं पड़ता, लेकिन ओटीटी की वजह से निर्माता के लिए लागत निकालना जरूर थोड़ा आसान हो गया है। इस बाबत अमूल मोहन कहते हैं, 'कलाकारों का कॅरियर भले ही आगे बढ़ जाए पर फिल्म को बनाने में लागत लगी है। कलाकारों को पारिश्रमिक भी दिया गया है। निर्माता को कुछ रिटर्न मिलने की आशा बनी है तो वे उन्हें रिलीज कर रहे हैं।'

कॅरियर पर प्रभाव:

फिल्मों की रिलीज में देरी से कलाकारों के कॅरियर पर प्रभाव पडऩे से अभिनेता पंकज त्रिपाठी असहमति जताते हैं। वह कहते हैं, 'इससे कलाकारों पर ज्यादा असर नहीं होता है। फिल्म अगर समय से आ जाती है तो उसका उत्साह अलग होता है। अगर मेरी फिल्म देर से रिलीज होती है तो मैं न बहुत ज्यादा परेशान होता हूं और न निराश। मुझे इस बात का संतोष रहता है कि मैंने अपना काम ईमानदारी से किया है। कई बार परिस्थितियां ऐसी होती हैं कि दिक्कतें आती हैं। मैं बस फिल्ममेकिंग की प्रक्रिया का आनंद लेता हूं। मेरी एक-दो फिल्में काफी देरी से रिलीज हुई हैं। मैंने देखा है कि अब लोग पहचानने लगे हैं तो मेरी बड़ी तस्वीर लगाकर उसे रिलीज किया गया, जबकि मेरा काम उसमें खास नहीं था। यह मार्केटिंग का तरीका है।Ó

यात्रा के अनुभव होते हैं खास:

नितिन कक्कड़ निर्देशित 'राम सिंह चार्ली' आज सोनी लिव पर रिलीज हो रही है। इसमें कुमुद मिश्रा लीड भूमिका में हैं। वह कहते हैं, 'कोई भी फिल्म करना मेरे लिए एक यात्रा के समान है जो फिल्म के साथ खत्म होती है। मेरे लिए यात्रा अहम है। फिल्म करने के दौरान मैंने जो भी हासिल किया है वह मेरी स्मृतियों में रहता है और परिपक्व बनाता है। जब हमारी फिल्म रिलीज नहीं हो पा रही थी तो हम परेशान थे। इंडस्ट्री में संघर्ष करना पड़ता है। ओटीटी प्लेटफॉर्म से अब हमारी फिल्म लोगों तक पहुंचने जा रही हैं। मेरा सफर जारी है। इस क्रम में पुष्पेंद्र कहते हैं, 'जहां तक फिल्ममेकर्स के कॅरियर की बात है तो वह स्थिर नहीं रहता। अच्छा बुरा सबकी जिंदगी में होता है। ऐसा नहीं है कि एक फिल्म फंस गई तो सारी फंस जाएंगी। आपको खुद पर यकीन करना होगा।

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बॉक्स फिल्म फेस्टिवल से प्रचार:

रिलीज से पहले कई बार निर्माता प्रतिष्ठित बुसान, टोरंटो, कान फिल्म फेस्टिवल्स में अपनी फिल्में प्रदर्शित करते हैं। ट्रेड एनालिस्ट अमूल मोहन कहते हैं कि फिल्म फेस्टिवल में अगर आपकी फिल्म का चयन न हो तो उसे दिखाने के लिए पैसे देने पड़ते है। वहां पर मिलने वाली दर्शकों की सकारात्मक प्रतिक्रिया आगे फिल्म की रिलीज का आधार बनती है। छह महीने या एक साल बाद जब फिल्में रिलीज हों तो उस प्रतिक्रिया के आधार पर अच्छी ओपनिंग मिले। यह प्रचार की रणनीति भी है। फेस्टिवल में फिल्म के खरीददार भी मिल सकते हैं।

आंकड़ों की अटकलें:

डिजिटल पर सटीक आंकड़े नहीं मिलते है। इस बाबत फिल्म बिरादरी के लोगों का कहना है कि एक आईडी पर निर्मित ओटीटी अकाउंट से तीन-चार डिवाइस पर कंटेंट देख सकते हैं। एक आईडी पर कई लोग फिल्में आपस में बांट कर देख लेते हैं। ऐसे में कैसे पता चलेगा कि कितने लोगों ने कंटेंट या फिल्म देखी। एक अकाउंट से कितने लोगों ने फिल्म देखी यह बताना संभव नहीं होगा। वह अलग विमर्श का विषय है। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर फिल्में हमेशा देखने को मिलेंगी यह उसका सबसे अहम पहलू है।

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