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संघर्ष का अंत कूटनीति और संवाद से ही संभव : पूर्व राजनयिक फैबियन

jantaserishta.com
24 Sept 2026 1:17 PM IST
संघर्ष का अंत कूटनीति और संवाद से ही संभव : पूर्व राजनयिक फैबियन
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नई दिल्ली: यूक्रेन और पश्चिम एशिया समेत दुनिया के कई हिस्सों में संघर्ष जारी है। भारत हमेशा कूटनीति और संवाद की जरूरत पर बल देता रहा है, फिलहाल जो स्थिति है इसकी अहमियत और बढ़ रही है। पूर्व राजनयिक के पी फैबियन ने आईएएनएस से बातचीत में माना कि युद्ध खत्म करने का कोई नया या पुराना रास्ता नहीं है, बल्कि बातचीत ही एकमात्र विकल्प है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कई बार कह चुके हैं कि लगातार बढ़ते संघर्षों का समाधान 'डिप्लोमेसी और डायलॉग' के जरिए ही संभव है।
उन्होंने कहा कि मौजूदा संघर्षों का असर केवल संबंधित देशों तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे लोगों की जान जा रही है, वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर पड़ रहा है और अंततः किसी को इसका लाभ नहीं मिल रहा।
अमेरिका-ईरान तनाव का जिक्र करते हुए पूर्व राजनयिक ने कहा, "राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सैन्य स्तर पर ईरान को झुकाने में अमेरिका की असमर्थता को स्वीकार किया है। इसका मतलब यह नहीं है कि ईरान ने अमेरिका को हरा दिया, बल्कि अमेरिका आत्मसमर्पण के लिए ईरान को मजबूर नहीं कर सका है।"
उन्होंने कहा कि ट्रंप का रुख अब इस बात पर निर्भर करेगा कि वह सैन्य दबाव के बजाय कूटनीतिक समाधान की दिशा में कितना आगे बढ़ते हैं। उनके मुताबिक, ट्रंप चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग पर दबाव डाल सकते हैं कि वह ईरान और हूती विद्रोहियों पर हमले रोकने या कम करने के लिए प्रभाव का इस्तेमाल करें।
उन्होंने खास तौर पर सऊदी अरब की स्थिति का उल्लेख करते हुए कहा, "देश गंभीर खतरे का सामना कर रहा है। अगर हमले कम होते हैं तो यह अमेरिका और ईरान के बीच सीधे संवाद की शुरुआत का आधार बन सकता है। यदि ट्रंप वास्तव में कूटनीतिक समाधान चाहते हैं तो अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत के जरिए रास्ता निकालना मुश्किल नहीं होगा।"
संयुक्त राष्ट्र की युद्ध रोकने में कथित विफलता की आलोचना पर पूर्व राजनयिक ने कहा, "संयुक्त राष्ट्र को इसके लिए जिम्मेदार ठहराना सही नहीं है। यह सच है कि संयुक्त राष्ट्र युद्धों को रोकने में सफल नहीं रहा है, लेकिन इसकी मुख्य वजह सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य देशों की भूमिका है। सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों के पास वीटो का अधिकार है और कई बार इन्हीं देशों के मतभेद संयुक्त राष्ट्र को प्रभावी कार्रवाई करने से रोकते हैं।"
यूक्रेन युद्ध का जिक्र करते हुए उन्होंने अमेरिका और रूस दोनों को परिस्थितियों के लिए जिम्मेदार बताया। उन्होंने कहा, "जब जो बाइडेन अमेरिका के राष्ट्रपति थे, तब अमेरिका की नीतियों ने ऐसी परिस्थितियां पैदा कीं, जिनमें रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के लिए सैन्य हस्तक्षेप से बचना मुश्किल हो गया। वहीं पश्चिम एशिया के मामले में उन्होंने सुरक्षा परिषद में अमेरिका की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया और कहा कि वहां अमेरिका की जिम्मेदारी अलग है।"
फैबियन के अनुसार, "संयुक्त राष्ट्र की आलोचना करने के बजाय उन देशों की भूमिका पर सवाल उठना चाहिए, जिनके पास सुरक्षा परिषद में निर्णायक शक्ति है।" अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो की प्रस्तावित भारत यात्रा को लेकर उन्होंने कहा कि किसी भी उच्चस्तरीय अमेरिकी यात्रा का भारत स्वागत करता है, लेकिन यह स्पष्ट होना चाहिए कि यात्रा का उद्देश्य क्या है।
उन्होंने कहा, "भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते को अंतिम रूप देना अच्छी बात होगी, लेकिन यदि रूबियो भारत पर किसी अंतरिम व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए दबाव बनाने आते हैं और इसके लिए 100 फीसदी टैरिफ की धमकी का इस्तेमाल किया जाता है, तो यह तरीका काम नहीं करेगा।"
भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों पर उन्होंने स्पष्ट कहा कि भारत किसी दबाव में आकर फैसला नहीं करेगा। उन्होंने कहा, "अगर अमेरिका भारत से अपनी शर्तों पर समझौते के लिए दबाव डालता है और 100 फीसदी टैरिफ की धमकी देता है तो भारत उस दबाव के आगे नहीं झुकेगा। भारत अपने हितों को ध्यान में रखकर फैसले करेगा और अमेरिका के निर्देश के आधार पर तेल का आयात नहीं करेगा। भारत तेल की खरीद का फैसला बाजार की परिस्थितियों और आर्थिक हितों को ध्यान में रखकर करेगा।"
उन्होंने कहा कि भारत और अमेरिका के बीच संबंध महत्वपूर्ण हैं और नई दिल्ली उच्चस्तरीय अमेरिकी यात्राओं का स्वागत करती है, लेकिन व्यापार और ऊर्जा जैसे मुद्दों पर भारत अपने फैसले स्वतंत्र रूप से करेगा।
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