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₹2,700 की दवा की MRP ₹27 हजार क्यों? सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से पूछा- इतना बड़ा अंतर क्यों..?

SHIDDHANT
29 Sept 2026 8:10 PM IST
₹2,700 की दवा की MRP ₹27 हजार क्यों? सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से पूछा- इतना बड़ा अंतर क्यों..?
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दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने दवाओं की कीमत और MRP में बड़े अंतर को लेकर केंद्र सरकार से सवाल किया है। कोर्ट ने पूछा कि दवाओं की रिटेल कीमत और MRP के बीच 16% से ज्यादा का अंतर क्यों होना चाहिए। सुनवाई के दौरान कैंसर की एक दवा का उदाहरण सामने आया, जिसकी रिटेल कीमत करीब ₹2,700 थी, जबकि उसकी MRP लगभग ₹27 हजार थी। कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया कि ऐसी ऊंची कीमतों का बोझ आखिर मरीज, सरकारी खजाने और टैक्सपेयर्स पर किस तरह पड़ता है।
दवाओं पर 16% से ज्यादा मार्जिन क्यों?
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच दवाओं की कीमत, जेनेरिक दवाओं की प्रिस्क्रिप्शन और मेडिकल डिवाइस के नियंत्रण से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा कि सभी दवाओं के लिए अधिकतम 16% मार्जिन की सीमा क्यों नहीं तय की जा सकती। अदालत ने यह भी जानना चाहा कि अलग-अलग दवाओं के लिए अलग-अलग नियम रखने की जरूरत क्यों है।
कोर्ट के सवालों का केंद्र बिंदु दवाओं की वास्तविक कीमत और उनकी MRP के बीच मौजूद बड़े अंतर पर रहा।
₹2,700 की दवा की MRP ₹27 हजार होने पर सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने कैंसर की एक दवा का उदाहरण देते हुए कीमतों के अंतर पर सवाल उठाया। इस दवा की रिटेल कीमत करीब ₹2,700 बताई गई, जबकि उसकी MRP लगभग ₹27 हजार थी।
कोर्ट ने सवाल किया कि अगर कोई मरीज सरकारी योजना के तहत इलाज करा रहा है और इतनी अधिक MRP वाली दवा खरीदी जाती है, तो इस अतिरिक्त रकम का भुगतान आखिर कौन करता है।
अदालत ने कहा कि ऐसी स्थिति में इसका बोझ सरकारी खजाने और अंततः टैक्सपेयर्स पर पड़ता है। इसी वजह से दवाओं की कीमत तय करने की व्यवस्था को लेकर कोर्ट ने गंभीर सवाल उठाए।
अस्पतालों की फार्मेसी को लेकर भी सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने प्राइवेट अस्पतालों में दवाओं की बिक्री के तरीके पर भी सवाल उठाया। कोर्ट ने कहा कि प्राइवेट अस्पताल इंडस्ट्री की तरह काम कर रहे हैं और मरीजों को अपनी ही फार्मेसी से दवा खरीदने के लिए मजबूर किया जाता है।
अदालत ने अस्पतालों के मुनाफे और दवाओं की कीमत तय करने के लिए एक समान नियम की जरूरत पर भी सवाल किया। सुनवाई में यह मुद्दा भी सामने आया कि मरीजों पर दवाओं की ऊंची कीमतों का आर्थिक दबाव किस तरह कम किया जा सकता है।
10 गुना या उससे ज्यादा मुनाफे पर कोर्ट की नजर
सुप्रीम कोर्ट ने दवाओं पर 10 गुना या उससे भी अधिक मुनाफे के आरोपों को लेकर सवाल किए। अदालत ने DPCO, 2013 के तहत जरूरी और गैर-जरूरी दवाओं के लिए मौजूद अलग-अलग नियमों पर भी सवाल उठाया।
केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने माना कि यह एक गंभीर मुद्दा है। उन्होंने कहा कि ऐसा समाधान खोजने की जरूरत है जिसमें मरीजों, सरकार और फार्मा कंपनियों के हितों के बीच संतुलन बनाया जा सके।
याचिकाकर्ताओं ने इलाज के बढ़ते खर्च का मुद्दा उठाया
याचिकाओं में दवाओं की कीमतों में भारी अंतर से मरीजों और सरकारी योजनाओं पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ का मुद्दा उठाया गया है।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि सरकार जिन दवाओं की कीमत तय करती है, बाजार में उनका हिस्सा कम है। वहीं, ऐसी दवाएं जिनकी कीमत सरकार की ओर से तय नहीं की जाती, उनका बाजार में हिस्सा करीब 80% या उससे अधिक बताया गया है।
याचिकाकर्ताओं के अनुसार, ऐसी दवाओं की शुरुआती MRP तय करने में कंपनियों को अधिक स्वतंत्रता मिलती है। उनका दावा है कि इससे दवाओं की कीमत और इलाज का कुल खर्च बढ़ सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि कई मरीज इलाज का खर्च उठाने के लिए अपनी संपत्ति या गहने तक बेचने के लिए मजबूर हो जाते हैं।
पिछली सुनवाई में भी कीमतों पर उठे थे सवाल
दवाओं की कीमतों का मुद्दा पिछली सुनवाई में भी सुप्रीम कोर्ट के सामने आया था। उस दौरान अदालत ने दवाओं की कीमतों में बड़े अंतर पर टिप्पणी करते हुए नियामक संस्थाओं की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए थे।
अब इस मामले में अगली सुनवाई *12 अक्टूबर* को होगी। उस दौरान दवाओं की कीमत तय करने की व्यवस्था, MRP और मरीजों पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ से जुड़े मुद्दों पर आगे सुनवाई होगी।
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