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सूरत की फैक्ट्रियों से क्यों टूट रहा मजदूरों का भरोसा? शुरू हुआ गांव चलो आंदोलन
jantaserishta.com
10 Oct 2026 4:10 PM IST

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कपड़ा उद्योग पर पड़ सकता है असर.
सूरत: गुजरात के सूरत में कपड़ा फैक्ट्रियों में काम करने वाले मजदूरों के बीच नाराजगी बढ़ती जा रही है। बिहार और उत्तर प्रदेश से रोजगार की तलाश में आए कई श्रमिक अब काम छोड़कर अपने गांव लौट रहे हैं। मजदूरों का आरोप है कि उनसे लंबे समय तक काम कराया जाता है, लेकिन सप्ताह में एक दिन की छुट्टी मांगने पर भी परेशानी का सामना करना पड़ता है। कुछ श्रमिकों ने समय पर वेतन नहीं मिलने और छुट्टी लेने पर पैसे काटे जाने की शिकायत भी की है।
इन्हीं समस्याओं के विरोध में शुरू हुआ 'गांव चलो आंदोलन' अब चर्चा में है। शुक्रवार को सूरत रेलवे स्टेशन पर घर लौटने वाले मजदूरों की बड़ी संख्या दिखाई दी। दिवाली और छठ पूजा से पहले अपने परिवारों के पास पहुंचने की तैयारी कर रहे इन श्रमिकों ने काम के हालात और अपनी मजबूरियों के बारे में बताया। हालांकि, कितने मजदूर वास्तव में लौट रहे हैं और कितने इस आंदोलन से जुड़े हैं, इसका स्वतंत्र आंकड़ा सामने होना जरूरी है।
छुट्टी मांगने पर वेतन कटने की शिकायत
अयोध्या लौट रहे प्रेमचंद्र ने बताया कि मजदूरों को सप्ताह में कम से कम एक दिन आराम मिलना चाहिए। उनके मुताबिक, कई बार मालिक छुट्टी देने की बात मान लेते हैं, लेकिन कुछ समय बाद फिर पहले जैसी व्यवस्था शुरू हो जाती है।
एक अन्य मजदूर अजय ने कहा कि जब उन्होंने घर जाने के लिए छुट्टी मांगी, तो उन्हें वेतन काटने की बात कही गई। प्रयागराज के राजीव कुमार पाल ने भी साप्ताहिक अवकाश नहीं मिलने और वेतन नहीं बढ़ने की शिकायत की। उनके अनुसार, रविवार की छुट्टी मांगने पर मालिक ने काम जारी रखने या नौकरी छोड़कर जाने का विकल्प दिया।
इन शिकायतों से पता चलता है कि कुछ श्रमिकों के लिए परिवार से मिलने जाना भी आसान नहीं रह गया है। जो लोग कई महीनों तक घर से दूर रहकर काम करते हैं, उनके लिए छुट्टी और समय पर वेतन मिलना बेहद जरूरी है।
गांव में खेती करना बेहतर विकल्प मान रहे मजदूर
लगातार काम और छुट्टी को लेकर होने वाली परेशानी के बीच कुछ श्रमिक अब गांव में ही रोजगार तलाशने की बात कह रहे हैं। प्रयागराज लौट रहे बृजेश निषाद ने बताया कि वह सूरत में चार-पांच महीने से काम कर रहे थे। उनका आरोप है कि छुट्टी लेने पर एक दिन का वेतन काट लिया जाता था। अब वह गांव जाकर खेती करने की योजना बना रहे हैं। उन्होंने कहा कि जरूरत पड़ने पर वह खीरा उगाकर अपना खर्च चलाने की कोशिश करेंगे। इसी तरह दूसरे मजदूरों ने भी कहा कि गांव में जो काम मिलेगा, उसे करके गुजारा कर लेंगे।
12 घंटे की ड्यूटी और नौकरी जाने का आरोप
मजदूरों की शिकायत केवल साप्ताहिक छुट्टी तक सीमित नहीं है। कुछ श्रमिकों ने रोजाना 12 घंटे काम करने और वेतन समय पर नहीं मिलने की बात कही है। मनोज कुमार सिंह के अनुसार, उन्हें रोजाना लंबी ड्यूटी करनी पड़ती थी। जब उन्होंने गांव जाने के लिए छुट्टी मांगी, तो उनकी सैलरी रोक दी गई। उन्होंने बताया कि उनके साथ फैक्ट्री से निकाले गए कई अन्य कर्मचारी भी घर लौट रहे हैं।
शिववंदन कुमार ने कहा कि मजदूर महीने में 26 दिन काम करने की बात कर रहे थे, जबकि उनसे 30 दिन काम करने को कहा गया। उन्होंने काम छोड़ने का फैसला किया और कहा कि भविष्य में लौटे भी तो पूरे महीने लगातार काम करने की शर्त स्वीकार नहीं करेंगे।
इन बयानों के आधार पर मजदूरों और फैक्ट्री मालिकों के बीच काम के दिनों, छुट्टी और वेतन को लेकर तनाव दिखाई देता है। हालांकि, अलग-अलग फैक्ट्रियों की परिस्थितियों और मालिकों का पक्ष सामने आने के बाद से ही पूरे मामले की तस्वीर स्पष्ट हो सकेगी।
लेबर यूनियन ने संभाली मजदूरों की मदद की जिम्मेदारी
मजदूरों के गांव लौटने के बीच लेबर यूनियन के प्रतिनिधि भी उनकी सहायता के लिए आगे आए हैं। यूनियन प्रतिनिधि अजय डी. दूबे ने बताया कि आंदोलन में शामिल श्रमिकों को पानी और बिस्किट जैसी जरूरी चीजें उपलब्ध कराई जा रही हैं।
दूबे ने आरोप लगाया कि आंदोलन शुरू होने के बाद कुछ मजदूरों को परेशान किया गया और नौकरी से निकाला गया। उनके मुताबिक, इन घटनाओं से जुड़े वीडियो भी उनके पास मौजूद हैं। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित फैक्ट्री मालिकों की प्रतिक्रिया सामने आना अभी महत्वपूर्ण है।
सूरत के कपड़ा उद्योग पर पड़ सकता है असर
सूरत देश के प्रमुख कपड़ा उत्पादन केंद्रों में शामिल है। यहां की टेक्सटाइल और एम्ब्रॉयडरी इकाइयों में बड़ी संख्या में प्रवासी श्रमिक काम करते हैं। ऐसे में अगर बड़ी संख्या में कर्मचारी काम छोड़कर लौटते हैं, तो उत्पादन और फैक्ट्रियों के रोजमर्रा के काम पर असर पड़ सकता है।
दूसरी तरफ, मजदूरों की मांगों में साप्ताहिक छुट्टी, समय पर वेतन और काम के बेहतर हालात जैसे मुद्दे शामिल हैं। इन समस्याओं का समाधान निकालना श्रमिकों और उद्योग, दोनों के लिए जरूरी है।
फिलहाल, 'गांव चलो आंदोलन' ने सूरत की फैक्ट्रियों में काम करने वाले प्रवासी मजदूरों की स्थिति पर ध्यान खींचा है। अब यह देखना होगा कि श्रमिकों की शिकायतों पर क्या कदम उठाए जाते हैं और क्या काम के हालात में बदलाव आता है।
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