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क्या है मुरिया दरबार, जहां राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू सुनेंगी आदिवासियों की फरियाद? जानिए 600 साल पुरानी परंपरा

jantaserishta.com
22 Oct 2026 3:27 PM IST
क्या है मुरिया दरबार, जहां राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू सुनेंगी आदिवासियों की फरियाद? जानिए 600 साल पुरानी परंपरा
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नई दिल्ली: छत्तीसगढ़ के बस्तर में होने वाला मुरिया दरबार यहां की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परंपराओं में खास स्थान रखता है। इसे आदिवासियों की संसद भी कहा जाता है, क्योंकि इस दरबार में उनकी समस्याएं सुनी जाती हैं और उनके समाधान पर चर्चा होती है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू अपने दो दिवसीय छत्तीसगढ़ दौरे के दौरान 23 अक्टूबर को जगदलपुर के सिरहासार भवन में आयोजित बस्तर दशहरे के मुरिया दरबार को संबोधित करेंगी। इस दौरान वह बस्तर के आदिवासियों की समस्याएं और उनकी फरियाद सुनेंगी। इसके बाद लालबाग मैदान में आयोजित आमसभा में भी शामिल होंगी।
आइए जानते हैं कि मुरिया दरबार क्या है, इसकी शुरुआत कैसे हुई और आज भी यह परंपरा क्यों महत्वपूर्ण मानी जाती है।
क्या है मुरिया दरबार?
मुरिया दरबार बस्तर संभाग के आदिवासियों की एक महत्वपूर्ण परंपरा है। बस्तर दशहरे के समापन से जुड़ी इस रस्म को आम बोलचाल में आदिवासियों की संसद कहा जाता है।
इतिहासकारों के मुताबिक, इस परंपरा की शुरुआत राजशाही के दौर में हुई थी। उस समय बस्तर के राजा-महाराजा दरबार लगाकर आदिवासियों की समस्याएं और शिकायतें सीधे सुनते थे। लोग अपनी परेशानियां राजा के सामने रखते थे, ताकि उनका समाधान किया जा सके।
इस परंपरा की खास बात यह थी कि राजा अपनी राजसी पोशाक छोड़कर साधारण कपड़े पहनते थे। इसका उद्देश्य लोगों को बिना किसी झिझक के अपनी बात रखने का अवसर देना था। दरबार में राजा-महाराजा आम लोगों की समस्याओं को गंभीरता से सुनते थे।
जमीन पर बैठकर लोगों की समस्याएं सुनते थे राजा
मुरिया दरबार की एक खास परंपरा यह भी रही कि राजा-महाराजा सिंहासन पर बैठने के बजाय जमीन पर बैठकर लोगों की समस्याएं सुनते थे। बस्तर संभाग के आदिवासी अपनी व्यक्तिगत और गांव से जुड़ी परेशानियां इस दरबार में रखते थे। वे राजा से समस्याओं के समाधान की गुहार लगाते थे। इसके बाद राजपरिवार की ओर से उनके निराकरण के लिए निर्देश दिए जाते थे।
यह परंपरा उस दौर से चली आ रही है, जब भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था नहीं थी और देश ब्रिटिश शासन के अधीन था। उस समय मुरिया दरबार आदिवासियों के लिए अपनी बात रखने का एक महत्वपूर्ण मंच था। समय के साथ शासन व्यवस्था बदली, लेकिन आदिवासियों की समस्याएं सुनने और उनकी बात सामने रखने से जुड़ी इस परंपरा का महत्व बना रहा।
राष्ट्रपति से क्यों जुड़ा है मुरिया दरबार?
समय के साथ मुरिया दरबार के स्वरूप में बदलाव आया, लेकिन इसकी परंपरा आज भी जारी है। मौजूदा व्यवस्था में राष्ट्रपति को इस दरबार से विशेष रूप से जोड़ा जाता है। राष्ट्रपति के शामिल नहीं हो पाने की स्थिति में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री दरबार में प्रमुख भूमिका निभाते हैं। बस्तर राजपरिवार के सदस्य भी इसमें मौजूद रहते हैं। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को मुरिया दरबार में आमंत्रित करने के लिए बस्तर के आदिवासी 15 अगस्त 2026 को राष्ट्रपति भवन, दिल्ली पहुंचे थे। उन्होंने राष्ट्रपति से मुलाकात कर उन्हें इस आयोजन में शामिल होने का न्योता दिया था।
इस बार राष्ट्रपति का जगदलपुर दौरा इसी परंपरा के लिहाज से महत्वपूर्ण है। वह मुरिया दरबार को संबोधित करने के साथ आदिवासी समुदाय के लोगों की फरियाद भी सुनेंगी।
कमलचंद्र भंजदेव हैं बस्तर राजपरिवार के वारिस
बस्तर के अंतिम शासक महाराजा प्रवीरचंद्र भंजदेव थे। वर्तमान में कमलचंद्र भंजदेव को पारंपरिक और औपचारिक रूप से बस्तर राजपरिवार का वारिस और राजा माना जाता है।
राजशाही के समय मुरिया दरबार में लोग अपने गांवों से जुड़ी समस्याएं लेकर आते थे। महाराजा उनकी परेशानियों को सुनते और समाधान के लिए निर्देश देते थे। इस व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य लोगों को अपनी बात रखने का अवसर देना और उनकी समस्याओं का निराकरण करना था। आज भी मुरिया दरबार बस्तर दशहरे की प्रमुख रस्मों में शामिल है और क्षेत्र की ऐतिहासिक विरासत को दर्शाता है।
बस्तर छत्तीसगढ़ का आदिवासी बहुल क्षेत्र है। यहां की परंपराएं, वेशभूषा और रीति-रिवाज अपनी अलग पहचान रखते हैं। मुरिया दरबार भी इसी सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। बताया जाता है कि यह परंपरा करीब 600 वर्षों से निभाई जा रही है। इसे गणतंत्र दिवस के अवसर पर दिल्ली में निकाली गई झांकी में भी प्रदर्शित किया गया था।
4 अक्टूबर 2025 को केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने बस्तर दौरे के दौरान मुरिया दरबार के प्रतिनिधियों से मुलाकात की थी। मां दंतेश्वरी की पूजा-अर्चना के बाद वह दरबार में शामिल हुए थे। इस दौरान उन्होंने मुरिया समाज के लोगों से नक्सलियों को मुख्यधारा में लाने के लिए अपील की थी।
कौन हैं मुरिया आदिवासी?
मुरिया जनजाति मुख्य रूप से छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में रहती है। इनकी आबादी कोंडागांव, नारायणपुर, बीजापुर, जगदलपुर और दंतेवाड़ा जैसे जिलों में पाई जाती है। इसके अलावा महाराष्ट्र, ओडिशा, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के कुछ सीमावर्ती क्षेत्रों में भी इस समुदाय के लोग रहते हैं।
मुरिया जनजाति को गोंड जनजाति की एक प्रमुख उपशाखा माना जाता है। इस समुदाय के तीन प्रमुख उपवर्ग बताए गए हैं—राजा मुरिया, घोटुल मुरिया और झोरिया मुरिया।
यह जनजाति अपनी पारंपरिक युवा गृह संस्था ‘घोटुल’ और सांस्कृतिक नृत्यों के लिए भी जानी जाती है।
कुल मिलाकर, मुरिया दरबार केवल बस्तर दशहरे की एक रस्म नहीं, बल्कि आदिवासियों को अपनी समस्याएं रखने का ऐतिहासिक मंच है। करीब छह शताब्दियों से चली आ रही यह परंपरा बस्तर की सांस्कृतिक पहचान और उसके राजशाही इतिहास की झलक पेश करती है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की इसमें भागीदारी से इस आयोजन का महत्व और बढ़ गया है।
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