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एक्यूआई को लेकर सतर्कता पूरे साल जरूरी, थोड़े समय से कुछ नहीं होगा: विशेषज्ञ
jantaserishta.com
29 Nov 2025 5:12 PM IST

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नई दिल्ली: राष्ट्रीय राजधानी का वायु प्रदूषण लगातार बढ़ रहा है। एक्यूआई स्तर बेहद गंभीर स्थिति तक पहुंच गया है। बिगड़ते हालातों के बीच हेल्थ एक्सपर्ट्स ने ऐसे समाधान खोजने की सलाह दी है जो कुछ समय तक ही काम न करें बल्कि इनकी मियाद लंबी हो यानी ऐसे उपाय पूरे साल गंभीरता से लागू किए जाएं।
दिल्ली की एयर क्वालिटी लगातार 15वें दिन भी बहुत खराब श्रेणी में रही। सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (सीपीसीबी) ने शनिवार सुबह 7 बजे एयर क्वालिटी इंडेक्स (एक्यूआई) 338 रिकॉर्ड किया। एम्स नई दिल्ली के पल्मोनरी मेडिसिन और स्लीप डिसऑर्डर विभाग के प्रोफेसर और हेड, डॉ. अनंत मोहन ने आईएएनएस को बताया, "हम हेल्थ इमरजेंसी के स्टेज पर पहुंच गए हैं। प्रदूषण रोकने की कोशिशें सिर्फ अस्थायी नहीं हो सकतीं; इससे कुछ समय के लिए तुरंत मदद मिल सकती है, लेकिन इस शहर को दीर्घकालिक सॉल्यूशन की तुरंत जरूरत है।"
उन्होंने आगे कहा, "हमें इस स्टेज पर अभी बहुत जल्दी कुछ करना होगा।" शुक्रवार को शहर का 24 घंटे का औसत एक्यूआई 369 था, जिससे दिल्ली में आधे महीने तक बहुत खराब एयर क्वालिटी बनी रही। एयर क्वालिटी और मौसम एजेंसियों के अनुमान बताते हैं कि आने वाले हफ्ते में कोई खास सुधार होने की उम्मीद नहीं है।
दिल्ली स्थित एम्स के पल्मोनरी मेडिसिन विभाग के डॉ. सौरभ मित्तल ने कहा, “अक्टूबर से दिसंबर के बीच हम प्रदूषण के बारे में खूब बात करते हैं, और इन तीन महीनों में हम बहुत एक्टिव रहते हैं। लेकिन ये जानना भी जरूरी है कि गर्मियों में भी एयर क्वालिटी अच्छी नहीं है। मौसम ठीक होने पर भी, वैश्विक मापदंडों के मुकाबले एयर क्वालिटी सबऑप्टिमल रहती है।”
मित्तल ने आगे कहा, “हमें ऐसे समाधान की जरूरत है जो पूरे साल काम करें, न कि एक निश्चित समय के लिए।” विशेषज्ञों ने कहा कि हवा का खराब स्तर दिल्ली की भौगोलिक स्थिति और मानव निर्मित कारकों की वजह से है।
अशोका यूनिवर्सिटी के डीन, रिसर्च और फिजिक्स और बायोलॉजी के प्रोफेसर गौतम मेनन ने आईएएनएस को बताया, “इंडो-गंगा (आईजीपी) यानी सिंधु-गंगा मैदानों के एयरशेड (वायुमंडलीय क्षेत्र) में दिल्ली भी शामिल है। राष्ट्रीय राजधानी में प्रदूषण का स्तर (दुनिया में) सबसे अधिक है। एक वजह इस इलाके की अनोखी ज्योग्राफी है, जो सर्दियों के महीनों में जब हवा धीमी हो जाती है, तो प्रदूषण को रोक लेती है। लेकिन यह कई दूसरी वजहों से और बढ़ जाता है। गाड़ियों की लगातार बढ़ती संख्या, बायोमास जलाना, बिना लाइसेंस वाली फैक्ट्रियां और लगातार बढ़ता निर्माण कार्य ये सब ऐसी वजह हैं जो मानव निर्मित हैं, मतलब ये हमारे नियंत्रण में होती हैं।”
वायु प्रदूषण का सेहत पर शॉर्ट-टर्म (अल्पकालिक) और लॉन्ग-टर्म (दीर्घकालिक) दोनों तरह का असर होता है। शॉर्ट-टर्म नतीजों में खांसी, आंखों में जलन, सिरदर्द और अस्थमा अटैक शामिल हैं, जबकि लॉन्ग-टर्म असर में सांस की बीमारियां, जिनमें सीओपीडी और फेफड़ों का कैंसर, हार्ट अटैक, स्ट्रोक और नर्वस सिस्टम को नुकसान, साथ ही बच्चों में उनके विकास से जुड़ी दिक्कतें जैसी गंभीर पुरानी बीमारियां शामिल हैं।
कई स्टडीज में बताया गया है कि पर्यावरण से निकलने वाले पॉल्यूटेंट्स, जैसे कार्बन मोनोऑक्साइड, ओजोन, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड और सल्फर डाइऑक्साइड, स्ट्रोक का मुख्य कारण हैं।
शहर के न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. (प्रो.) पी. एन. रेनजेन ने आईएएनएस को बताया, "छोटे पार्टिकुलेट मैटर (पीएम 2.5) फेफड़ों के जरिए हमारे ब्लडस्ट्रीम में जाते हैं और ब्लड वेसल को नुकसान पहुंचाते हैं, जिससे ब्लड प्रेशर बढ़ता है।" विशेषज्ञों ने मास्क पहनने और सुबह-सुबह बाहर जाने से बचने की सलाह दी।
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