HIV संक्रमण से ग्रस्त रहते है ट्रांसजेंडर्स और सेक्स वर्कर, ब्लड डोनेट करने पर रोक लगाने की वजह

दिल्ली। केंद्र सरकार ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में ट्रांसजेंडर्स, समलैंगिक पुरुषों (MSM) और महिला सेक्स वर्कर्स को संभावित रक्तदाताओं (Blood Donors) की सूची से बाहर रखने के अपने फैसले का बचाव किया है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह कदम किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं है, बल्कि यह उन स्वास्थ्य अध्ययनों पर आधारित है जिनमें पाया गया है कि इन समूहों में एचआईवी (HIV) संक्रमण का खतरा आम लोगों की तुलना में 6 से 13 गुना अधिक है।
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ के समक्ष अपना पक्ष रखते हुए, एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि 'राष्ट्रीय रक्त नीति' का मुख्य उद्देश्य हमेशा सबसे सुरक्षित डोनर पूल से रक्त प्राप्त करना होता है। एएसजी भाटी ने अदालत को बताया कि उच्च जोखिम वाले समूहों से ब्लड और उसके घटक प्राप्त करना राष्ट्रीय रक्त नीति के सिद्धांतों के खिलाफ है। स्वास्थ्य मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट में दायर अपने हलफनामे में भी इस बात की पुष्टि की है। मंत्रालय ने कहा- ऐसे पर्याप्त और ठोस सबूत मौजूद हैं जो दर्शाते हैं कि ट्रांसजेंडर्स, समलैंगिक पुरुषों और महिला सेक्स वर्कर्स को एचआईवी, हेपेटाइटिस बी और हेपेटाइटिस सी संक्रमण का सबसे अधिक खतरा रहता है।
स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग की 2020-21 की वार्षिक रिपोर्ट का हवाला देते हुए मंत्रालय ने कहा कि वयस्क आबादी में एचआईवी के प्रसार की तुलना में इन विशिष्ट समूहों में एचआईवी का प्रसार 6 से 13 गुना अधिक है। मंत्रालय ने यह भी बताया कि इस तरह के प्रतिबंध केवल भारत में ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर लागू हैं। हलफनामे में कहा गया है- पूरी दुनिया में एचआईवी और 'ट्रांसफ्यूजन-ट्रांसमिटेड इंफेक्शन' (ब्लड चढ़ाने से फैलने वाले संक्रमण) के उच्च जोखिम वाले जनसंख्या समूहों के लिए रक्तदान पर इसी तरह के प्रतिबंध मौजूद हैं। उदाहरण के तौर पर, अधिकांश यूरोपीय देशों में यौन रूप से सक्रिय समलैंगिक पुरुषों (MSM) को रक्तदान करने से स्थायी रूप से वर्जित किया गया है।





