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कल मराठा आरक्षण पर आएगा सुप्रीम कोर्ट का फैसला

Apurva Srivastav
4 May 2021 6:01 PM GMT
कल मराठा आरक्षण पर आएगा सुप्रीम कोर्ट का फैसला
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मराठा आरक्षण को लेकर मुंबई उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर बुधवार को सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आएगा

मराठा आरक्षण को लेकर मुंबई उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर बुधवार को सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आएगा. सुबह 10.30 बजे सुप्रीम कोर्ट यह फैसला सुनाएगा. उच्च न्यायालय ने थोड़े बहुत संशोधन के साथ देवेंद्र फडणवीस की सरकार द्वारा दिए गए मराठा आरक्षण को कायम रखा था. इसे बाद में सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई. सुप्रीम कोर्ट ने इस पर 26 मार्च को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था. आखिरकार वो दिन आ गया है जब सुप्रीम कोर्ट वो फैसला सुनाएगा जिससे यह तय हो जाएगा कि मराठा समाज को शिक्षा और नौकरी में आरक्षण दिया जाए या नहीं. इसी फैसले पर आगे यह भी निर्भर करेगा कि जाट, गुर्जर, पटेलों को आरक्षण दिए जाने की मांग आगे चल कर पूरी हो सकेगी या नहीं.

इस प्रकरण पर न्यायमूर्ति अशोक भूषण की अध्यक्षता में 5 न्यायाधीशों की बेंच फैसला देने वाली है. आरक्षण की सीमा को 50 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ाया जा सकता है या नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सभी राज्यों से अपनी राय जाहिर करने को कहा था. सुनवाई के दौरान यह तर्क दिया गया था कि 50 प्रतिशत से ज्यादा आरक्षण नहीं देने का 1992 का सुप्रीम कोर्ट का जो निर्णय (इंदिरा साहनी केस) था वो चूंकि एकमत से नहीं हुआ था, इसलिए उस निर्णय को भंग किया जा सकता है और 50 प्रतिशत से ज्यादा आरक्षण दिया जा सकता है. सुप्रीम कोर्ट बुधवार को इस पर अपनी राय स्पष्ट कर देगा.
15 मार्च से 26 मार्च तक चली सुनवाई में उठे सवाल
15 मार्च से 26 मार्च तक सुप्रीम कोर्ट में चली सुनवाई में जो सवाल उठे थे उनमें प्रमुख थे कुछ सवाल यह थे कि क्या कोई राज्य किसी समाज को आरक्षण देने की पहल करता है तो वो आर्टिकल 102 का उल्लंघन करता है? अगर राज्य को यह अधिकार नहीं है तो 2018 का महाराष्ट्र सरकार द्वारा मराठों को दिया गया आरक्षण अपने आप अवैध हो जाएगा. 102 वें संविधान संशोधन के अनुसार, आरक्षण केवल तभी दिया जा सकता है जब किसी विशेष समुदाय का नाम राष्ट्रपति द्वारा तैयार की गई सूची में हो. यानी अगर किसी नई जाति को पिछड़े वर्ग की लिस्ट में जोड़ना हो तो NCBC की सलाह और संसद की स्वीकृति से राष्ट्रपति ही लिस्ट में कोई बदलाव कर सकते हैं. कोई राज्य यह फैसला नहीं कर सकता.
लेकिन 102 वें संविधान संशोधन अधिनियम के खिलाफ ये तर्क दिया गया कि इससे तो राज्यों के लिए अलग लिस्ट बनाने के विधानसभा के अधिकार की अवहेलना होती है. उच्चतम न्यायालय ने इस बात को समझा और यह माना कि इस मामले का असर सभी राज्यों पर पड़ेगा. इसलिए उच्चतम न्यायालय ने सभी राज्यों से अपनी राय देने को कहा.
ऐसे पहुंचा मामला सुप्रीम कोर्ट
2018 में महाराष्ट्र में भारतीय जनता पार्टी (BJP) सरकार ने गायकवाड़ कमीशन के सुझाव पर मराठों को पिछड़ा मान लिया और 16 प्रतिशत आरक्षण की घोषणा कर दी. पिछड़ों ने विरोध किया. गायकवाड़ कमीशन को ही बोगस बताया गया. कहा गया कि कमीशन के सदस्यों में पिछड़ों का प्रतिनिधित्व ना के बराबर था. इसलिए गायकवाड़ कमीशन की रिपोर्ट को पिछड़ों ने नकार दिया. मामला हाई कोर्ट पहुंचा. हाई कोर्ट ने आरक्षण घटा कर नौकरी में 13 और शिक्षा में 12 प्रतिशत कर दिया. सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई. सुप्रीम कोर्ट ने स्टे दे दिया.
अब यह मिसाल देने की वजह यह है कि मराठों को वर्तमान चौखटे में आरक्षण नहीं दिया जा सकता था. क्योंकि पिछड़ा वर्ग मराठों को पिछड़ा मानने को तैयार नहीं. इसलिए मराठों को अलग से आरक्षण दिया गया. ऐसे में आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत को पार कर गई. हालांकि कई राज्यों में आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत को पार कर चुकी है. लेकिन उन सबके खिलाफ याचिका लंबित है. अब इसी समस्या का समाधान ढूंढने का समय आ गया है.
अब तक क्या हुआ?
न्यायमूर्ति अशोक भूषण, न्या. एल.नागेश्वर राव, न्या. एस. अब्दुल नजीर, न्या. हेमंत गुप्ता व न्या. रवींद्र भट की पीठ के सामने इस मामले की अंतिम सुनवाई 15 मार्च को शुरू हुई. तमिलनाडू, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश आदि राज्यों ने आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत से अधिक बढ़ाने के पक्ष में अपना मत दिया. सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने आर्टिकल 102 से जुड़ा होने की वजह से इस मुद्दे को संवैधानिक मुद्दा बताया.
इसके पहले एटॉर्नी जनरल के.के. वेणुगोपाल ने संविधान विशेषज्ञ के तौर पर अपनी राय दी. तमिलनाडू, छत्तीसगढ़ और कर्नाटक की ओर से वकालत करते हुए वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने कहा कि 50 प्रतिशत की सीमा कोई अंतिम नहीं हो सकती और जिस वक्त इंदिरा साहनी केस का यह निर्णय आया जिसमें 50 प्रतिशत की सीमा रखी गई थी उस वक्त तो आर्थिक आरक्षण का परिदृश्य देश के सामने नहीं आया था. 50 प्रतिशत के तर्क से तो आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग को आरक्षण देने का निर्णय भी खटाई में पड़ जाएगा. वैसे भी सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिया गया वह निर्णय एक मत से नहीं हुआ था.
आर्थिक आधार पर 10 प्रतिशत आरक्षण का आधार क्या?
अब तक एक बात साफ समझ में आ गई होगी कि भारत मे सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग के लोगों के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया है. आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के लिए नहीं. लेकिन 2019 में मोदी सरकार ने एक पहल की. संविधान में 103 वां संशोधन किया गया. इस संशोधन के तहत आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों को शिक्षा और नौकरियों में 10 प्रतिशत का आरक्षण दिया गया.
चूंकि इसमें पिछड़ों के आरक्षण को छेड़ा नहीं गया था. यह आरक्षण अलग से दिया गया था. इसलिए पिछड़ों ने इसका विरोध भी नहीं किया. यह एक तरह से सवर्णों में जो लोग गरीब रह गए हैं, उन्हें आरक्षण के दायरे में लाने का प्रयास था. लेकिन नीयत कितनी भी नेक हो, नीति का प्रश्न तो खड़ा हो ही गया. आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत को पार कर ही गई. बुधवार के सुप्रीम कोर्ट के फैसले में इन सभी मुद्दों पर स्थिति साफ हो जाएगी और सालों से ज्वलंत आरक्षण के मुद्दे पर सवाल तो कई उठे, एक समाधान भी मिल जाएगा.


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