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रुद्रप्रयाग का वह पावन मंदिर, जहां मिलती है असीम आध्यात्मिक शांति

jantaserishta.com
30 March 2026 10:11 AM IST
रुद्रप्रयाग का वह पावन मंदिर, जहां मिलती है असीम आध्यात्मिक शांति
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उत्तराखंड: उत्तराखंड की पावन भूमि पर स्थित कई प्राचीन मंदिर अपनी आस्था, परंपरा और प्राकृतिक सुंदरता समेटे हुए है। इन्हीं में से एक है कार्तिक स्वामी मंदिर, जो भगवान शिव के पुत्र भगवान कार्तिकेय को समर्पित है।
यह मंदिर ऊंचे पहाड़ी इलाके में स्थित है, जहां धार्मिक महत्व के साथ-साथ प्रकृति की खूबसूरती भी मन मोह लेती है। कार्तिक स्वामी मंदिर रुद्रप्रयाग जिले के क्रौंच पर्वत के शिखर पर बना है। यह उत्तर भारत का एकमात्र मंदिर है, जो भगवान कार्तिकेय को समर्पित है। मंदिर तक पहुंचने के लिए कनकचौरी गांव से छोटी ट्रेकिंग करनी पड़ती है। यहां से हिमालय की बर्फ से ढकी चोटियों का मनोरम नजारा दिखाई देता है। चारों ओर फैली हरियाली, ऊंचे पर्वत और शांत वातावरण भक्तों को आध्यात्मिक शांति प्रदान करता है।
सोमवार को उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने मंदिर के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर मंदिर का एक खास वीडियो पोस्ट किया। इसमें उन्होंने इसकी भव्यता के महत्व के बारे में बताते हुए लिखा, "जनपद रुद्रप्रयाग में स्थित कार्तिक स्वामी मंदिर देवाधिदेव महादेव के पुत्र श्री कार्तिकेय को समर्पित एक दिव्य एवं पवित्र स्थल है। ऊंचे पर्वत शिखर पर विराजमान यह पावन मंदिर केवल आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि अद्भुत प्राकृतिक सौंदर्य और आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुपम संगम भी है। आप भी रुद्रप्रयाग आगमन पर इस पावन मंदिर के दर्शन अवश्य करें।"
मंदिर के पीछे एक पौराणिक कहानी है, जिसके अनुसार, एक बार भगवान शिव ने अपने दोनों पुत्रों कार्तिकेय और गणेश की परीक्षा लेने का विचार किया। उन्होंने कहा कि जो भी पहले पूरे ब्रह्मांड का चक्कर लगाकर वापस आएगा, उसकी पूजा सबसे पहले की जाएगी।
यह सुनकर कार्तिकेय अपने वाहन पर बैठकर ब्रह्मांड का चक्कर लगाने निकल गए। लेकिन गणेश जी ने बहुत बुद्धिमानी से काम लिया। उन्होंने अपने माता-पिता पार्वती और भगवान शिव के चारों ओर परिक्रमा की और कहा, "मेरे लिए आप ही पूरा ब्रह्मांड हैं, इसलिए आपकी परिक्रमा करना ही ब्रह्मांड का चक्कर लगाने जैसा है।"
गणेश जी की इस समझदारी से भगवान शिव बहुत प्रसन्न हुए और उन्हें वरदान दिया कि हर शुभ काम से पहले सबसे पहले गणेश जी की पूजा की जाएगी।
जब कार्तिकेय वापस लौटे और यह देखा, तो वे बहुत दुखी और क्रोधित हो गए। उन्होंने अपना शरीर माता-पिता को समर्पित कर दिया और केवल हड्डियों के रूप में क्रौंच पर्वत पर चले गए। मान्यता है कि कार्तिक स्वामी मंदिर में आज भी भगवान कार्तिकेय की अस्थियों की पूजा की जाती है।
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