भारत
बंगाली भाषी प्रवासी मजदूरों की हिरासत पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती
Shantanu Roy
14 Aug 2025 2:41 PM IST

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केंद्र और नौ राज्यों से मांगा तलब
New Delhi. नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक अहम जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार और नौ राज्यों से जवाब मांगा है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि बंगाली भाषी प्रवासी मजदूरों को बांग्लादेशी नागरिक होने के शक में मनमाने तरीके से हिरासत में लिया जा रहा है। यह याचिका पश्चिम बंगाल माइग्रेंट वेलफेयर बोर्ड की ओर से दायर की गई थी। न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने मामले को गंभीर मानते हुए सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया, हालांकि पीठ ने तुरंत हिरासत पर रोक लगाने का अंतरिम आदेश देने से इनकार कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसा आदेश देने से उन लोगों पर भी असर पड़ेगा जो सचमुच अवैध रूप से सीमा पार कर भारत आए हैं और जिन्हें कानून के तहत निर्वासित किया जाना चाहिए।
पीठ ने कहा-
“जिन राज्यों में ये प्रवासी मजदूर काम कर रहे हैं, उन्हें उनके मूल राज्य से उनके bona fide की जांच का अधिकार है, लेकिन समस्या जांच के दौरान की अवधि में है। यदि हम कोई अंतरिम आदेश पारित करते हैं तो इसके गंभीर परिणाम होंगे, खासकर उन लोगों के लिए जो अवैध रूप से सीमा पार कर आए हैं।”
याचिकाकर्ता के आरोप
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने दलील दी कि कई राज्यों में केवल बंगाली भाषा बोलने या उस भाषा में लिखित दस्तावेज रखने के आधार पर मजदूरों को हिरासत में लिया जा रहा है। इसके पीछे उन्होंने गृह मंत्रालय के एक पुराने परिपत्र का हवाला दिया, जिसके तहत कथित रूप से ऐसी कार्यवाही को बढ़ावा दिया जा रहा है।
भूषण ने कहा कि प्रवासी मजदूरों को न सिर्फ हिरासत में लिया जा रहा है, बल्कि कुछ मामलों में उनके साथ मारपीट और दुर्व्यवहार भी किया गया है। उन्होंने अदालत से अनुरोध किया कि जांच पर उन्हें कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन जांच पूरी होने तक मजदूरों को हिरासत में न रखा जाए, ताकि निर्दोष लोगों का उत्पीड़न रोका जा सके।
अदालत की टिप्पणी
पीठ ने माना कि वास्तविक भारतीय नागरिकों को सिर्फ भाषा के आधार पर संदेह के घेरे में लाना और लंबे समय तक हिरासत में रखना संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन हो सकता है। अदालत ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में एक संतुलित व्यवस्था बनाने की जरूरत है, जिससे वैध नागरिकों की सुरक्षा भी हो और अवैध रूप से आने वालों की पहचान व कार्रवाई भी प्रभावित न हो।
अदालत ने केंद्र सरकार के साथ-साथ ओडिशा, राजस्थान, महाराष्ट्र, दिल्ली, बिहार, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, हरियाणा और पश्चिम बंगाल सरकार से जवाब मांगा है। कोर्ट ने सभी से चार हफ्तों में विस्तृत हलफनामा दाखिल करने को कहा है, जिसमें यह स्पष्ट किया जाए कि बंगाली भाषी प्रवासी मजदूरों की पहचान, जांच और हिरासत के लिए क्या प्रक्रिया अपनाई जा रही है।
अगली सुनवाई
मामले की अगली सुनवाई चार हफ्ते बाद होगी। तब तक अदालत सभी पक्षों से विस्तृत जवाब पर विचार करेगी और यह तय करेगी कि जांच के दौरान हिरासत पर रोक लगाने या प्रक्रिया में बदलाव के लिए कोई निर्देश जारी किए जाएं या नहीं। इस केस ने प्रवासी मजदूरों के अधिकारों और पहचान संबंधी प्रक्रियाओं पर एक नई बहस छेड़ दी है, खासकर उन राज्यों में जहां बंगाली भाषी मजदूरों की संख्या अधिक है।
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