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38 साल पुराने नौकरी विवाद में सुप्रीम कोर्ट का फैसला, महिला उम्मीदवार को नौकरी न देने पर IOC को 12 लाख रुपए मुआवजा देने का आदेश

Shantanu Roy
18 Sept 2026 3:16 PM IST
38 साल पुराने नौकरी विवाद में सुप्रीम कोर्ट का फैसला, महिला उम्मीदवार को नौकरी न देने पर IOC को 12 लाख रुपए मुआवजा देने का आदेश
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New Delhi. नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (IOC) को सुमित्रा को 12 लाख रुपए मुआवजा देने का आदेश दिया है। करीब 38 साल पहले LPG बॉटलिंग प्लांट में नौकरी के लिए योग्य होने के बावजूद उन्हें नियुक्ति नहीं दी गई थी। मामले में सामने आया कि महिला होने के कारण उन्हें सिलेंडर उठाने में सक्षम नहीं माना गया था। अब उनकी उम्र रिटायरमेंट की सीमा तक पहुंच चुकी है, इसलिए कोर्ट ने नौकरी के बजाय मुआवजे का आदेश दिया।
1988 में इंटरव्यू के बाद भी नहीं मिली नौकरी
सुमित्रा हरियाणा के गुढ़ा गांव की रहने वाली हैं। साल 1988 में उनका नाम उन 49 उम्मीदवारों की सूची में था, जिन्हें डिप्टी कमिश्नर की अध्यक्षता वाली समिति ने IOC के LPG बॉटलिंग प्लांट में काम के लिए सिफारिश की थी। उन्होंने खलासी, चपरासी या रीफिलिंग हेल्पर के पद के लिए इंटरव्यू दिया था। हालांकि, उन्हें नियुक्ति पत्र नहीं मिला, जबकि सूची में शामिल दूसरे लोगों को नौकरी दे दी गई। इसके बाद सुमित्रा ने नौकरी नहीं दिए जाने के फैसले को चुनौती देते हुए ट्रायल कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
ट्रायल कोर्ट ने माना, योग्यता पूरी करती थीं
ट्रायल कोर्ट ने अपने फैसले में माना कि सुमित्रा संबंधित नौकरी के लिए जरूरी योग्यता पूरी करती थीं। अदालत ने एक गवाह के बयान का भी उल्लेख किया, जिससे यह सामने आया कि महिला होने के कारण उन्हें नौकरी नहीं दी गई थी। इस फैसले के खिलाफ IOC ने अपील की। 6 अगस्त 1993 को प्रथम अपीलीय अदालत ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलट दिया। इसके बाद यह मामला हरियाणा हाईकोर्ट होते हुए सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा।
सिलेंडर उठाने की दलील पर कोर्ट ने पूछा सवाल
सुप्रीम कोर्ट में IOC की ओर से वकील ने दलील दी कि संबंधित काम में भारी LPG सिलेंडर उठाने पड़ते हैं और कर्मचारियों को रात की शिफ्ट भी करनी होती है। इसी आधार पर अधिकारियों ने शायद सुमित्रा को इस काम के लिए उपयुक्त नहीं माना था।
इस दलील पर कोर्ट ने सवाल किया कि क्या महिलाएं अपने घरों में गैस सिलेंडर नहीं उठाती हैं?
जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम पंचोली की बेंच ने IOC के इस फैसले पर नाराजगी जताई। कोर्ट ने कहा कि केवल महिला होने के आधार पर नौकरी से इनकार करना नारीत्व का अपमान है।
रिटायरमेंट की उम्र के कारण नौकरी की जगह मुआवजा
सुप्रीम कोर्ट के सामने अब एक व्यावहारिक स्थिति यह भी थी कि सुमित्रा रिटायरमेंट की उम्र तक पहुंच चुकी हैं। ऐसे में इतने पुराने मामले में उन्हें अब नौकरी देना संभव नहीं था। इसी वजह से कोर्ट ने नौकरी देने के बजाय उन्हें 12 लाख रुपए का मुआवजा देने का आदेश दिया है। यह आदेश उस भेदभाव के मामले में दिया गया है, जिसमें महिला उम्मीदवार की योग्यता के बावजूद उसे नियुक्ति नहीं दी गई थी।
कोर्ट ने महिला गरिमा का मुद्दा उठाया
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि भारत में महिलाओं के सम्मान की बात की जाती है और उन्हें देवी के समान माना जाता है। ऐसे में सरकार की कंपनी की ओर से केवल महिला होने के आधार पर किसी उम्मीदवार को नौकरी के लिए अनुपयुक्त मानना महिला की गरिमा का अपमान है। कोर्ट की टिप्पणी का केंद्र यह था कि किसी महिला को सिर्फ उसके लिंग के आधार पर काम करने में अक्षम मानकर नौकरी से बाहर नहीं किया जा सकता।
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