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सर्वोच्च न्यायालय से डॉग लवर्स को झटका

jantaserishta.com
19 May 2026 11:17 AM IST
सर्वोच्च न्यायालय से डॉग लवर्स को झटका
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सभी याचिकाएं खारिज.

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने डॉग लवर्स को झटका देते हुए उनकी सभी याचिकाएं खारिज कर दी है. सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को अपने नवंबर 2025 के उस आदेश में बदलाव करने से इनकार कर दिया, जिसमें अस्पतालों, स्कूलों, कॉलेजों, बस स्टेशनों और रेलवे स्टेशनों जैसे सार्वजनिक संस्थानों और जगहों से आवारा कुत्तों को हटाने का निर्देश दिया गया था. कोर्ट ने कहा कि कड़वी सच्चाइयों के सामने आंखें नहीं बंद की जा सकती हैं.

अपने पिछले निर्देश का बचाव करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आवारा कुत्तों के हमलों की घटनाएं सार्वजनिक सुरक्षा के लिए एक गंभीर चिंता का विषय बन गई हैं. बेंच ने गौर किया कि देश भर में सामने आई कई घटनाओं में छोटे बच्चों को कुत्तों ने नोच डाला, बुज़ुर्गों पर हमले हुए और यहां तक कि विदेशी पर्यटक भी प्रभावित हुए.
अदालत ने सार्वजनिक जगहों से कुत्तों को हटाने की बात भी कही है. अदालत ने कहा है कि ये समस्या अब बेहद विकराल रूप ले चुकी है और पूर्व में दिए गए निर्देशों के बावजूद जमीनी स्तर पर इसके निपटाम में गंभीर कमियां मौजूद हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, 'जमीन पर डार्विन का सिद्धांत- Survival of the Fittest काम करता हुआ लगता है, जहां समाज के कमज़ोर तबकों को प्रभावी सरकारी कार्रवाई के अभाव में अपनी सुरक्षा खुद करने के लिए छोड़ दिया जाता है.'
कोर्ट ने जोर देकर कहा कि बच्चों और बुज़ुर्गों को ऐसे खतरों से अकेले निपटने के लिए नहीं छोड़ा जा सकता. सरकारों का यह कर्तव्य है कि वे जिंदगी और सार्वजनिक सुरक्षा की रक्षा सुनिश्चित करें. बेंच ने सार्वजनिक जगहों से आवारा कुत्तों को हटाकर आश्रय स्थलों में भेजने के अपने पिछले आदेश को वापस लेने या उसमें ढील देने से इनकार कर दिया है.
आज की सुनवाई में सबसे जरूरी बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने यह भी बताया कि अनुच्छेद 21 के तहत जिंदगी और आजादी के अधिकार में हर नागरिक का यह अधिकार शामिल है कि वह बिना किसी शारीरिक हमले के लगातार डर या सार्वजनिक जगहों पर कुत्तों के काटने जैसी जानलेवा घटनाओं के खतरे के आजादी से घूम सके और सार्वजनिक जगहों तक पहुंच बना सके.
बेंच ने आगे कहा, "राज्य मूक दर्शक बनकर नहीं रह सकता, जहां ह्यूमन लाइफ के लिए ऐसे खतरे, जिन्हें रोका जा सकता है. ऐसी घटनाएं उन वैधानिक तंत्रों के बावजूद बढ़ती जा रही हैं, जिन्हें विशेष रूप से इन खतरों से निपटने के लिए ही बनाया गया है."
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