
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने उपभोक्ता विवादों के निपटारे को लेकर राज्यों को एक महत्वपूर्ण निर्देश दिया है। शीर्ष अदालत ने कहा है कि जिन राज्यों में लंबित उपभोक्ता मामलों की संख्या एक हजार से कम है, वे कुछ जिला उपभोक्ता फोरम को समाप्त करने पर विचार कर सकते हैं। हालांकि इसके लिए संबंधित राज्य को अपने क्षेत्राधिकार वाले हाई कोर्ट से पहले अनुमति लेनी होगी।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने 22 जुलाई को यह आदेश जारी किया। सुप्रीम कोर्ट इस समय देशभर के उपभोक्ता आयोगों के कामकाज, नियुक्तियों, सेवा शर्तों और बुनियादी सुविधाओं की निगरानी कर रहा है। इसी प्रक्रिया के दौरान अदालत ने कम मामलों वाले राज्यों में उपभोक्ता फोरम की संख्या को लेकर यह सुझाव दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जिन राज्यों में कुल लंबित उपभोक्ता विवाद एक हजार से भी कम हैं, वे कुछ जिला उपभोक्ता आयोगों को समाप्त कर सकते हैं और वहां लंबित मामलों को नियमित अदालतों या न्यायिक अधिकारियों को सौंप सकते हैं। हालांकि यह कदम उठाने से पहले संबंधित हाई कोर्ट की अनुमति लेना जरूरी होगा।
पीठ ने कहा कि छोटे राज्यों में बहुत कम मामलों के बावजूद अलग-अलग उपभोक्ता आयोगों को बनाए रखना कई बार आर्थिक रूप से मुश्किल हो जाता है। ऐसे राज्यों को अपनी जरूरत और लंबित मामलों की संख्या को ध्यान में रखते हुए व्यवस्था में बदलाव करने की स्वतंत्रता दी जा सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले 11 फरवरी को दिए आदेश में कई छोटे राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की स्थिति का उल्लेख किया था। इनमें अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, त्रिपुरा, मिजोरम, मणिपुर, गोवा, लक्षद्वीप और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह शामिल हैं। इन राज्यों और क्षेत्रों ने अदालत के सामने दलील दी थी कि यहां उपभोक्ता विवादों की संख्या काफी कम है, लेकिन अलग-अलग आयोगों के संचालन में बड़ा वित्तीय खर्च आता है।
अदालत ने कहा कि जहां मामलों की संख्या बेहद कम है, वहां संसाधनों का बेहतर उपयोग करने के लिए वैकल्पिक व्यवस्था बनाई जा सकती है। इससे सरकार पर पड़ने वाला आर्थिक बोझ कम होगा और न्याय व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाया जा सकेगा।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी चिंता जताई कि कुछ राज्यों में अभी तक उचित तरीके से गठित राज्य उपभोक्ता आयोग मौजूद नहीं हैं। कई जगहों पर आयोगों के गठन और उनके संचालन में कमी पाई गई है। अदालत ने निर्देश दिया कि ऐसे मामलों को संबंधित हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल के पास भेजा जाए, ताकि उपभोक्ताओं को प्रभावी विवाद समाधान की सुविधा मिल सके।
पीठ ने यह भी कहा कि जहां नियमित राज्य उपभोक्ता आयोग उपलब्ध नहीं हैं, वहां हाई कोर्ट के एकल न्यायाधीश और मौजूदा तकनीकी सदस्यों की मदद से मामलों की सुनवाई की व्यवस्था की जा सकती है। इससे उपभोक्ताओं को न्याय पाने में देरी नहीं होगी।
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश उपभोक्ता न्याय व्यवस्था को अधिक व्यवस्थित और व्यावहारिक बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत का उद्देश्य है कि जहां अधिक मामले हैं, वहां पर्याप्त संसाधन उपलब्ध रहें और जहां मामले कम हैं, वहां अनावश्यक प्रशासनिक खर्च को कम किया जा सके।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से छोटे राज्यों में उपभोक्ता विवादों के निपटारे की प्रक्रिया को सरल बनाया जा सकता है। हालांकि जिला फोरम खत्म करने का फैसला लेने से पहले हाई कोर्ट की मंजूरी और उपभोक्ताओं के हितों की सुरक्षा को प्राथमिकता देनी होगी। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि किसी भी बदलाव का मुख्य उद्देश्य उपभोक्ताओं को समय पर और प्रभावी न्याय दिलाना होना चाहिए।





