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यूनुस सरकार के खिलाफ छात्रों का मोर्चा, कैंपस से सड़कों तक गूंजा विरोध

SHIDDHANT
11 Nov 2025 8:01 PM IST
यूनुस सरकार के खिलाफ छात्रों का मोर्चा, कैंपस से सड़कों तक गूंजा विरोध
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यूनुस सरकार ने ‘जनता से किया वादा तोड़ा
Bangladesh बांग्लादेश। शिक्षा नीति में किए गए एक बदलाव ने अब एक सांस्कृतिक आंदोलन का रूप ले लिया है। ढाका, चटगांव, राजशाही और जगन्नाथ यूनिवर्सिटी समेत देश की कई प्रमुख यूनिवर्सिटीज़ में छात्र और शिक्षक सड़कों पर उतर आए हैं। उनकी मांग है कि सरकार स्कूलों में संगीत और शारीरिक शिक्षा (पीटी) शिक्षकों की नियुक्ति बहाल करे, जिसे हाल ही में रद्द कर दिया गया था। दरअसल, मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार, जिसने इस साल की शुरुआत में शेख हसीना सरकार के पतन के बाद सत्ता संभाली, ने प्रशासनिक जटिलताओं और बजट की कमी का हवाला देते हुए यह नियुक्ति योजना रद्द कर दी थी। लेकिन प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि असली कारण सरकार का इस्लामिक कट्टरपंथी समूहों के दबाव में आना है, जिन्होंने संगीत और पीटी जैसे विषयों को ‘गैर-इस्लामिक’ करार दिया है।

ढाका यूनिवर्सिटी, जो हमेशा से छात्र आंदोलनों का केंद्र रही है, में सैकड़ों छात्रअपराजेय बंगलाप्रतिमा के नीचे जमा हुए और 1971 के मुक्ति संग्राम के गीत गाते हुए विरोध प्रदर्शन किया। एक बैनर पर लिखा था — “आप स्कूलों में संगीत को रोक सकते हैं, लेकिन बांग्लादेशियों के दिलों से उसे नहीं निकाल सकते। आंदोलन का नेतृत्व कला और मानविकी के छात्र कर रहे हैं। थिएटर प्रोफेसर इसराफिल शाहीन ने कहा, “संस्कृति कभी धर्म के खिलाफ नहीं होती। यही हमारी राष्ट्रीय पहचान है। इसके बिना शिक्षा अधूरी और खोखली है।” वहीं संगीत शिक्षक अजीजुर रहमान तुहिन ने कहा, “कला ही सभ्यता की नींव है, और उसे मिटाने की कोशिश आत्मा को खत्म करने जैसी है।

प्रदर्शनकारियों का कहना है कि यह आंदोलन केवल शिक्षकों की नियुक्ति के लिए नहीं, बल्कि बांग्लादेश की आत्मा और पहचान को बचाने की लड़ाई है। कई शिक्षाविदों और विश्लेषकों ने भी इस नीति को कट्टरपंथियों के दबाव में लिया गया निर्णय बताया है। राजनीतिक विश्लेषक रफीक हसन का कहना है, “बांग्लादेश एक सांस्कृतिक क्रांति से पैदा हुआ था, लेकिन अब वह उसी विरासत को आस्था के नाम पर मिटाने के खतरे में है।”
वहीं, सरकार पर दबाव बढ़ता जा रहा है। हिफाजत-ए-इस्लाम और इस्लामी आंदोलन बांग्लादेश जैसे संगठनों ने स्कूलों में धार्मिक शिक्षकों की नियुक्ति की मांग की है।
ढाका में एक छात्र ने कहा — “यह बजट का मुद्दा नहीं, पहचान का सवाल है। अगर संस्कृति खत्म हो गई, तो बांग्लादेश की आत्मा भी खत्म हो जाएगी।
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