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कोविड काल में खाना न मिलने से आवारा कुत्ते हो गए आक्रामक
jantaserishta.com
5 March 2023 12:50 PM IST

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लखनऊ (आईएएनएस)| कोविड से पहले आवारा कुत्ते हर किसी के दैनिक जीवन का हिस्सा थे। वे हर समय हर जगह पाए जाते थे। सह-अस्तित्व शांतिपूर्ण था। लेकिन कोविड ने सब कुछ बदल दिया।
लोगों ने बाहर निकलना बंद कर दिया। कुत्तों को देने के लिए कोई नहीं था। रेस्तरां बंद हो गए थे और आवारा कुत्ते कई दिनों तक बिना भोजन के रहे।
कैनाइन ब्रीडर राणा बताते हैं, महामारी के दौरान, कुत्ते भोजन की तलाश में इधर-उधर भटकते थे। जैसे ही वे सड़कों पर किसी इंसान को देखते, वे भोजन के लिए उसकी ओर दौड़ पड़ते। संक्रमण से आशंकित लोगों ने आवारा कुत्तों को भगाना शुरू कर दिया। वे उन पर पथराव करते थे, उन्हें डंडों से पीटते थे और यहां तक कि उन पर तेजाब भी फेंकते थे। इससे कुत्तों और मनुष्यों के बीच दुश्मनी की भावना पैदा हुई और तभी से हमले शुरू हो गए।
उन्होंने कहा, कोविड ने करुणा को भी मार डाला और खुद जीवित रहने के लिए मनुष्य जानवर बन गया।
पेटा की राधिका सूर्यवंशी कहती हैं, कुत्ते मिलनसार, सामाजिक जानवर होते हैं, जो आम तौर पर इंसान पर हमला नहीं करते। फिर भी जब लोग आवारा कुत्तों पर चिल्लाते हैं, उन्हें लात मारते हैं, उन पर पत्थर फेंकते हैं, उन पर गर्म पानी या तेजाब फेंकते हैं, उन्हें जहर देते हैं या उन्हें अन्य तरीकों से दुर्व्यवहार करते हैं, तो कुत्ते खुद को या अपने पिल्लों की रक्षा करने की आवश्यकता महसूस करते हैं।
जानकीपुरम में एक ऊंची इमारत में रहने वाले शौर्य कुलश्रेष्ठ, जहां दो महीनों में कुत्तों के हमले की पांच घटनाएं हो चुकी हैं, इस बात की पुष्टि करते हुए कहते हैं, अहाते में आवारा कुत्ते हमेशा से रहे हैं। पहला हमला तब हुआ था, जब एक बच्चे ने खेलते समय एक पिल्ले पर पत्थर फेंकना शुरू कर दिया। इस पर कुत्ते की मां ने बच्चे पर हमला कर दिया। तब से निवासी कुत्ते को देखते हैं, तो वे उन्हें डंडों से मारते हैं। सुरक्षा गार्ड को भी अवारा कुत्तों को मारने के लिए कहा गया है। हम परिसर में उनके प्रवेश को नियंत्रित नहीं कर सकते।
बहुमंजिली इमारतों में रहने वाले लोगों का आवारा पशुओं से दुश्मनी बढ़ती जा रही है। उन्हें लगता है कि आवारा कुत्ते उनकी सुरक्षा के लिए खतरा हैं और परिसर को गंदा करते हैं।
आवारा कुत्तों की आबादी में वृद्धि को महामारी और उसके बाद के लॉकडाउन को भी जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।
जैसा कि एक पशु विशेषज्ञ कहते हैं। लॉकडाउन के दौरान, बहुत कम वाहनों का आवागमन था। इस अवधि के दौरान पैदा हुए पिल्ले बच गए, जिससे कुत्तों की आबादी बढ़ गई। इसके अलावा, इस दौरान जानवरों पर ध्यान नहीं दिया गया था और कोई नसबंदी कार्यक्रम नहीं चलाया जा रहा था।
एक सेवानिवृत्त पशु चिकित्सा अधिकारी को लगता है कि एक प्रभावी नसबंदी कार्यक्रम इन्हें रोकने में मदद कर सकता है।
समय के साथ, जैसे-जैसे कुत्ते प्राकृतिक मौत मरते हैं, उनकी संख्या घटती जाती है। कुत्तों की आबादी स्थिर, गैर-प्रजनन, गैर-आक्रामक और रेबीज मुक्त हो जाती है, और यह समय के साथ धीरे-धीरे कम हो जाती है।
उन्होंने कहा, पशु जन्म नियंत्रण (कुत्ते) नियम, 2001 के तहत नगरपालिकाओं का यह कर्तव्य है कि कुत्तों की नसबंदी का एक प्रभावी कार्यक्रम चलाया जाए। यदि सभी नगर पालिकाओं ने इसे गंभीरता से लिया होता, तो आज अवारा कुत्तों की समस्या नहीं खड़ी होती।
जानवरों से निपटने वाले कई गैर सरकारी संगठनों की राय है कि आवारा पशुओं और विशेष रूप से इंडी नस्ल को अपनाने को प्रोत्साहित करने के लिए एक सतत जागरूकता अभियान की आवश्यकता है।
ऐसे ही एक एनजीओ के एक सदस्य ने कहा, एक कुत्ता एक कुत्ता होता है। वास्तव में, इंडी कुत्ते मजबूत, अधिक स्नेही और कम रखरखाव वाले होते हैं, लेकिन लोगों को लगता है कि एक विदेशी नस्ल का मालिक होने से उनकी प्रतिष्टा बढ़ जाएगी।
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