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नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर से संबंधित अपीलों की सुनवाई कर रहे अपीलीय ट्रिब्यूनल के न्यायाधीशों को जल्द डिजिटल सिग्नेचर सर्टिफिकेट के जरिए पोर्टल इस्तेमाल करने की सुविधा मिलने की संभावना है। इससे आधार आधारित प्रमाणीकरण को लेकर जारी गतिरोध दूर होने की उम्मीद है। चुनाव आयोग से जुड़े सूत्रों के हवाले से प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, पोर्टल पर एक साथ कई आदेश अपलोड करने और अंतिम आदेश जारी करने से पहले उसका ड्राफ्ट सुरक्षित रखने की सुविधाएं भी उपलब्ध कराई गई हैं।
यह बदलाव न्यायाधीशों की ओर से पोर्टल की कार्यप्रणाली पर उठाई गई आपत्तियों के बाद सामने आया है। न्यायाधीशों ने व्यक्तिगत आधार विवरण के इस्तेमाल की अनिवार्यता पर असहमति जताई थी। उनका कहना था कि अपीलों पर निर्णय अपलोड करने के लिए निजी आधार संख्या साझा करने की शर्त उचित नहीं है। डिजिटल हस्ताक्षर की व्यवस्था लागू होने के बाद आदेशों के प्रमाणीकरण का विकल्प मिलेगा। हालांकि, उपलब्ध रिपोर्टों में इसे जल्द लागू होने वाला बदलाव बताया गया है; सभी न्यायाधीशों के लिए सुविधा शुरू हो जाने की पुष्टि अभी नहीं हुई है।
इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, डिजिटल हस्ताक्षर अगले पांच दिनों में उपलब्ध कराए जाने की उम्मीद है। इससे एक महीने से अधिक समय से प्रभावित आदेश अपलोड करने की प्रक्रिया आगे बढ़ सकेगी। रिपोर्ट में बताया गया कि 21 सितंबर से न्यायाधीश पोर्टल पर आदेश अपलोड नहीं कर पा रहे थे। तकनीकी व्यवस्था और आधार प्रमाणीकरण की शर्त को लेकर आपत्ति के कारण यह स्थिति बनी। संबंधित अधिकारियों तथा ट्रिब्यूनल के बीच समाधान तलाशने की प्रक्रिया जारी थी।
पोर्टल में एक साथ कई आदेश अपलोड करने की सुविधा विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानी जा रही है। पहले प्रत्येक आदेश अलग-अलग अपलोड करना पड़ता था। नई व्यवस्था से पहले से पारित आदेशों को डिजिटल रिकॉर्ड में दर्ज करने में लगने वाला समय कम हो सकता है। इसके अतिरिक्त न्यायाधीश आदेश का प्रारूप ड्राफ्ट के रूप में सुरक्षित रख सकेंगे। अंतिम रूप देने से पहले उसमें आवश्यक सुधार किए जा सकेंगे। इन सुविधाओं का उद्देश्य आदेश तैयार करने और उन्हें पोर्टल पर जारी करने की प्रक्रिया आसान बनाना है। दस्तावेजों की स्वीकार्यता से संबंधित समस्या भी न्यायाधीशों की प्रमुख आपत्तियों में शामिल थी। पहले पोर्टल में एसआईआर के दौरान निर्धारित 13 श्रेणियों के दस्तावेजों तक विकल्प सीमित होने की शिकायत की गई थी। न्यायाधीशों का कहना था कि अपील की सुनवाई में अन्य प्रासंगिक दस्तावेजों पर विचार करने की गुंजाइश भी होनी चाहिए। उनके अनुसार, तकनीकी प्रणाली न्यायिक विवेक को सीमित नहीं कर सकती। इस मुद्दे को लेकर चुनाव आयोग के समक्ष पत्राचार और बैठकों के माध्यम से आपत्तियां दर्ज कराई गई थीं।
नवीनतम रिपोर्ट के मुताबिक, दस्तावेजों की सूची में ‘कोई अन्य दस्तावेज’ की अतिरिक्त श्रेणी जोड़ी गई है। इससे न्यायाधीश किसी व्यक्ति की मतदाता सूची में शामिल होने की पात्रता तय करने के लिए उपयुक्त समझे गए अन्य दस्तावेज भी रिकॉर्ड में ले सकेंगे। इस बदलाव से अपीलों में उपलब्ध सामग्री का व्यापक परीक्षण संभव होने की उम्मीद है। यह दस्तावेज स्वीकार करने की तकनीकी सुविधा है; किसी दस्तावेज को कितना महत्व देना है और अपील का परिणाम क्या होगा, इसका निर्णय संबंधित ट्रिब्यूनल करेगा।
इससे पहले इंडियन एक्सप्रेस ने न्यायाधीशों द्वारा दर्ज कराई गई अन्य समस्याओं की जानकारी दी थी। इनमें पक्षकारों को नोटिस भेजने, अतिरिक्त दस्तावेज अपलोड करने, ऑनलाइन सुनवाई और आदेश डाउनलोड करने से संबंधित बाधाएं शामिल थीं। रिपोर्ट के अनुसार, अगस्त की बैठक में इन मुद्दों का उल्लेख किया गया था। बाद में पोर्टल अपडेट किया गया, लेकिन आधार प्रमाणीकरण की नई आवश्यकता को लेकर फिर आपत्ति सामने आई। न्यायाधीशों ने सितंबर और अक्टूबर में संबंधित अधिकारियों को समस्या दूर करने के लिए लिखा था। रिपोर्ट में यह अंतर भी सामने आया कि कुछ अपीलों पर भौतिक रूप से आदेश पारित किए जा रहे थे, लेकिन उन्हें ऑनलाइन अपलोड करने में बाधा बनी हुई थी। इसलिए पोर्टल पर आदेश नहीं दिखने को प्रत्येक मामले में सुनवाई या निर्णय बिल्कुल नहीं होने के समान नहीं माना जा सकता। डिजिटल रिकॉर्ड अपडेट होने से संबंधित पक्षों को आदेश की स्थिति समझने में मदद मिलेगी। इसके साथ आगे की प्रक्रिया के लिए आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध कराने का काम भी अधिक व्यवस्थित हो सकेगा।
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