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शुभेंदु अधिकारी ने ली CM पद की शपथ, आजादी के बाद पहली बार बंगाल को मिला BJP का मुख्यमंत्री

jantaserishta.com
9 May 2026 11:32 AM IST
शुभेंदु अधिकारी ने ली CM पद की शपथ, आजादी के बाद पहली बार बंगाल को मिला BJP का मुख्यमंत्री
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PM मोदी समेत कई दिग्गज नेता रहे मौजूद.
West Bengal CM Oath Ceremony: शुभेंदु अधिकारी ने बंगाल के नए मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण कर लिया है. इसी के साथ वो बंगाल में बीजेपी के पहले सीएम बन गए हैं. उन्हें बंगाल के राज्यपाल ने शपथ दिलाई.
शुभेंदु अधिकारी ने शपथ ग्रहण करते ही पीएम मोदी के पांव छूकर उनका आशीर्वाद लिया. इसके बाद पीएम मोदी ने उन्हें गले लगा लिया. शुभेंदु ने मंच पर मौजूद सभी नेताओं से एक-एक करके हाथ मिलाया और सभी ने उन्हें बधाई दी. जब शुभेंदु योगी आदित्यनाथ से मिलने पहुंचे तो उन्होंने गमछा पहनाकर उनका अभिवादन किया.
अटके प्रोजेक्ट्स पर दिखेगी 'डबल इंजन' रफ्तार
पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणाम सामने आते ही केंद्र सरकार ने राज्य में सालों से अटकी केंद्रीय योजनाओं और परियोजनाओं को तेजी से आगे बढ़ाने की तैयारी शुरू कर दी है. सूत्रों के अनुसार केंद्र सरकार ने सभी मंत्रालयों से उन योजनाओं और परियोजनाओं की सूची मांगी है जो पिछले लगभग 12 सालों से ममता बनर्जी सरकार के विरोध, देरी या प्रशासनिक अड़चनों के कारण लंबित पड़ी थीं.
सूत्रों का कहना है कि इस पूरी कवायद की जिम्मेदारी रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह सौंपी गई है. उन्होंने कई मंत्रालयों से ऐसी योजनाओं का विस्तृत ब्यौरा मांगा है, जो पश्चिम बंगाल में बाधित रही हैं. मंत्रालयों ने संबंधित सूचनाएं भेजना भी शुरू कर दिया है. केंद्र सरकार का उद्देश्य नई सरकार के गठन के तुरंत बाद इन परियोजनाओं के रास्ते की बाधाएं दूर कर तेज गति से काम शुरू करना है.
पिछले एक दशक में केंद्र और पश्चिम बंगाल सरकार के बीच कई योजनाओं को लेकर लगातार टकराव देखने को मिला. कई केंद्रीय योजनाएं राज्य में लागू नहीं की गईं या फिर उनके नाम बदलकर लागू किया गया. कई परियोजनाओं को जमीन आवंटन, प्रशासनिक अनुमति या अन्य कारणों से लंबे समय तक रोके रखा गया. अब केंद्र सरकार इन्हें प्राथमिकता के आधार पर आगे बढ़ाने की तैयारी कर रही है.
सबसे प्रमुख योजना आयुष्मान भारत है जिसे पश्चिम बंगाल सरकार ने लागू करने से इनकार कर दिया था. इस योजना के तहत पात्र परिवारों को 5 लाख रुपये तक का स्वास्थ्य बीमा मिलता है. ममता बनर्जी सरकार का कहना था कि राज्य की ‘स्वास्थ्य साथी’ योजना बेहतर है, केंद्र की 60:40 फंडिंग व्यवस्था और प्रधानमंत्री की तस्वीर वाले स्वरूप पर भी आपत्ति थी. पीएम मोदी पहले ही कह चुके हैं कि नई सरकार की पहली कैबिनेट बैठक में ही आयुष्मान भारत योजना को मंजूरी दी जाएगी.
प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना को लेकर भी लंबे समय तक केंद्र और राज्य सरकार के बीच विवाद रहा. ममता सरकार अपनी ‘कृषक बंधु’ योजना को प्राथमिकता देती रही. हालांकि बाद में इसे आंशिक रूप से लागू किया गया, लेकिन लाभार्थियों के सत्यापन को लेकर खींचतान जारी रही. अब केंद्र सरकार इसे पूरी क्षमता के साथ लागू कराने की तैयारी में है.
इसी तरह महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी एक्ट यानी मनरेगा के फंड को कथित अनियमितताओं के कारण केंद्र ने रोक दिया था. इसे लेकर राज्य सरकार ने केंद्र पर आर्थिक नाकेबंदी का आरोप लगाया था. अब केंद्र इसे नए ढांचे के साथ आगे बढ़ाने की तैयारी में है.
प्रधानमंत्री आवास योजना नाम बदलकर ‘बांग्ला आवास योजना’ किए जाने और उसमें कथित अनियमितताओं के बाद 2022 से फंडिंग रुकी हुई थी. अब इस योजना को दोबारा सक्रिय करने की तैयारी की जा रही है.
केंद्र सरकार के अनुसार प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना को पश्चिम बंगाल में काफी देर से लागू किया गया और आवंटित राशि का सीमित उपयोग हुआ. वहीं जल जीवन मिशन के तहत आवंटित फंड के बेहतर उपयोग और प्रभावी तरीके से लागू करने पर जोर दिया जाएगा.
शिक्षा क्षेत्र में पीएम श्री स्कूल नई शिक्षा एवं भाषा नीति और ‘उल्लास’ जैसी योजनाओं को लागू करने की तैयारी है. साथ ही प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत रुकी परियोजनाओं को भी मंजूरी मिलने की संभावना है. नमामि गंगे प्रोग्राम के तहत गंगा सफाई से जुड़े कई सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट भूमि उपलब्ध न होने के कारण वर्षों से लंबित हैं.
केंद्र सरकार कई बार संसद में यह मुद्दा उठा चुकी है कि पश्चिम बंगाल में जमीन नहीं मिलने से परियोजनाओं में देरी हुई. अब इन प्रोजेक्ट्स को तेजी से पूरा करने की तैयारी है. इसी तरह अंतरराष्ट्रीय सीमा पर संवेदनशील क्षेत्रों में बॉर्डर फेंसिंग को लेकर भी केंद्र और राज्य सरकार के बीच विवाद रहा. केंद्र का आरोप था कि आवश्यक भूमि उपलब्ध नहीं कराई गई. अब इसे प्राथमिकता के साथ आगे बढ़ाने की योजना बनाई गई है.
प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना को छोड़कर पश्चिम बंगाल सरकार ने अपनी ‘बांग्ला शस्य बीमा’ योजना शुरू की थी. राज्य सरकार का तर्क था कि उसका मॉडल किसानों के लिए अधिक लाभकारी है, जबकि केंद्र ने इसे राजनीतिक श्रेय लेने की कोशिश बताया.
मृदा स्वास्थ्य कार्ड, और पीएम-प्रणाम जैसी योजनाओं को लागू करने की गति को लेकर भी केंद्र ने राज्य सरकार पर उदासीनता का आरोप लगाया. केंद्र सरकार की रणनीति साफ है कि लंबे समय से रुकी परियोजनाओं को तेज गति से पूरा कर जमीन पर ‘डबल इंजन सरकार’ का असर दिखाया जाए. साथ ही केंद्रीय योजनाओं का दायरा बढ़ाकर लाभार्थियों की संख्या में विस्तार किया जाए, ताकि केंद्र सरकार की योजनाओं का सीधा लाभ अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचे.
कौन हैं शुभेंदु?
बंगाल की राजनीति में शुभेंदु अधिकारी बड़े दिलचस्प नाम हैं. इसकी वजह है उनका पूरा राजनीतिक करियर. जो नंदीग्राम से शुरू हुआ और उसी नंदीग्राम से उन्होंने विरोध और जीत की एक अलग ही इबारत भी लिखी है. शुभेंदु अधिकारी की राजनीतिक जिंदगी सिर्फ उनकी कहानी भर नहीं है, बल्कि इस बात का उदाहरण भी है कि राजनीति का पहिया किस कदर घूमता है. जो व्यक्ति कभी ममता बनर्जी का सबसे बड़ा हितैषी और भऱोसेमंद सहयोगी था, वही उनका सबसे बड़ा राजनीतिक विरोधी बन गया और उन्हें दो बार हराया भी.
नंदीग्राम से भवानीपुर तक की उनकी यात्रा सिर्फ राजनीतिक उतार-चढ़ाव की कहानी नहीं, बल्कि बंगाल की बदलती राजनीति का भी प्रतीक है. लगातार दो बार ममता बनर्जी को चुनावी मुकाबले में हराने के बाद अब शुभेंदु अधकारी को बंगाल की राजनीति का ‘जायंट किलर’ कहा जा रहा है. लेकिन यहां तक पहुंचने का उनका रास्ता बिल्कुल आसान नहीं था.
शुभेंदु अधकारी का जन्म पूर्व मेदिनीपुर के प्रभावशाली अधकारी परिवार में हुआ. कहा जाता है कि बचपन से ही उनका झुकाव आध्यात्मिकता की ओर था. वे नियमित रूप से रामकृष्ण मिशन जाया करते थे और घर में जमा किए गए छोटे-छोटे पैसे भी वहां दान कर देते थे. परिवार के लोग तक यह सोचने लगे थे कि शुभेंदु कभी भी सांसारिक जीवन छोड़कर संन्यास का रास्ता चुन सकते हैं.
हालांकि बाद में उन्होंने गृहस्थ जीवन से दूरी बनाए रखने का फैसला किया, लेकिन राजनीति को ही अपना जीवन बना लिया. उन्होंने शादी न करने का संकल्प लिया और पूरी तरह सार्वजनिक जीवन में उतर गए.
शुभेंदु अधकारी की राजनीतिक यात्रा 1980 के दशक के आखिर में शुरू हुई. उन्होंने कांथी के प्रभात कुमार कॉलेज से छात्र राजनीति में कदम रखा. शुरुआत में वे कांग्रेस की छात्र इकाई छात्र परिषद से जुड़े. उस समय कांग्रेस में सोमेन मित्रा गुट का प्रभाव था और शुभेंदु ने उसी धड़े के साथ राजनीति की बारीकियां सीखीं. इसके बाद 1995 में उन्होंने कांथी नगरपालिका चुनाव कांग्रेस के टिकट पर लड़ा और पार्षद बने. यह उनकी पहली बड़ी चुनावी सफलता थी. उस समय तक बंगाल में वाम मोर्चे का दबदबा था और कांग्रेस लगातार कमजोर हो रही थी.
1998 में ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस बनाई. शुरुआत में शुभेंदु अधकारी तुरंत पार्टी में शामिल नहीं हुए, लेकिन कुछ समय बाद वे टीएमसी में आ गए. उनके पिता शिशिर अधकारी भी ममता के साथ थे. 1999 के लोकसभा चुनाव में कांथी सीट से तृणमूल उम्मीदवार नितीश सेनगुप्ता की जीत में अधकारी परिवार की बड़ी भूमिका रही. इसके बाद ममता ने शुभेंदु पर भरोसा बढ़ाया और 2001 में उन्हें मुगबेड़िया विधानसभा सीट से उम्मीदवार बनाया. हालांकि वे वाम मोर्चा नेता किरणमय नंदा से हार गए.
2004 में तामलुक लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने पर भी उन्हें सीपीएम के लक्ष्मण सेठ के हाथों हार का सामना करना पड़ा. लगातार दो बड़ी हारों ने शुभेंदु को झटका जरूर दिया, लेकिन उन्होंने राजनीति नहीं छोड़ी.
2006 का चुनाव शुभेंदु के लिए टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ. वे दक्षिण कांथी सीट से जीतकर पहली बार विधायक बने. लेकिन असली पहचान उन्हें 2007 के नंदीग्राम आंदोलन से मिली. उस समय राज्य में वाम मोर्चा सरकार उद्योग परियोजनाओं के लिए जमीन अधिग्रहण कर रही थी. नंदीग्राम में इसका बड़ा विरोध हुआ और आंदोलन ने हिंसक रूप ले लिया. शुभेंदु अधकारी इस आंदोलन का सबसे बड़ा चेहरा बनकर उभरे.
25 नवंबर 2007 को नंदीग्राम में तृणमूल कार्यकर्ताओं पर हमले के आरोप लगे और इसके बाद अधकारी परिवार ने वामपंथियों के खिलाफ आक्रामक आंदोलन शुरू किया. नंदीग्राम आंदोलन ने पूरे बंगाल में ममता बनर्जी को नई ताकत दी और शुभेंदु को राज्यव्यापी पहचान दिलाई.
2008 के पंचायत चुनाव में शुभेंदु अधकारी की रणनीति के दम पर तृणमूल कांग्रेस ने पूर्व मेदिनीपुर जिला परिषद पर कब्जा कर लिया. उसी साल ममता बनर्जी ने उन्हें युवा तृणमूल कांग्रेस का अध्यक्ष बना दिया. 2009 के लोकसभा चुनाव में शुभेंदु ने अपने पुराने प्रतिद्वंद्वी लक्ष्मण सेठ को हराकर तामलुक सीट जीत ली. इसके बाद अधकारी परिवार का प्रभाव पूर्व मेदिनीपुर में और बढ़ गया.
2011 में पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन हुआ और 34 साल पुरानी वाम सरकार गिर गई. तृणमूल कांग्रेस सत्ता में आई. इस दौर में अधकारी परिवार को पार्टी के सबसे ताकतवर राजनीतिक घरानों में गिना जाने लगा. 2014 में भी शुभेंदु ने लोकसभा चुनाव जीता. लेकिन इसी दौरान पार्टी के भीतर बदलाव शुरू हो गए.
2014 के बाद तृणमूल कांग्रेस में अभिषेक बनर्जी का कद तेजी से बढ़ने लगा. पार्टी संगठन में नई पीढ़ी को आगे लाने की रणनीति अपनाई गई. इसी दौरान शुभेंदु अधकारी को युवा तृणमूल अध्यक्ष पद से हटाकर सौमित्र खां को जिम्मेदारी दी गई. साथ ही अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व में ‘युवा’ नाम का अलग संगठन बनाया गया. यहीं से शुभेंदु और पार्टी नेतृत्व के बीच दूरी बढ़ने लगी.
2016 में शुभेंदु नंदीग्राम से विधायक बने और ममता सरकार में मंत्री भी बनाए गए. लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में पश्चिम मेदिनीपुर में तृणमूल का प्रदर्शन खराब रहने के बाद उनसे कई जिम्मेदारियां वापस ले ली गईं. 2020 तक आते-आते उन्हें जिला पर्यवेक्षक समेत कई अहम पदों से हटा दिया गया. यह साफ संकेत था कि पार्टी में उनका प्रभाव कम किया जा रहा है.
आखिरकार 19 दिसंबर 2020 को शुभेंदु अधकारी ने तृणमूल कांग्रेस छोड़कर बीजेपी का दामन थाम लिया. यह बंगाल राजनीति का बड़ा मोड़ था. बीजेपी को एक ऐसा नेता मिल गया, जो जमीनी संगठन, हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण और तृणमूल की अंदरूनी राजनीति—तीनों को अच्छी तरह समझता था. 2021 के विधानसभा चुनाव में नंदीग्राम सीट पर सीधे ममता बनर्जी और शुभेंदु अधकारी के बीच मुकाबला हुआ. पूरे देश की नजर इस सीट पर थी. आखिरकार शुभेंदु ने बेहद करीबी मुकाबले में ममता बनर्जी को हरा दिया.
यह जीत सिर्फ एक सीट की जीत नहीं थी, बल्कि प्रतीकात्मक रूप से बंगाल की राजनीति में बीजेपी के उभार की सबसे बड़ी घटना मानी गई. इसके बाद शुभेंदु पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता बने.
इसके बाद शुभेंदु अधकारी लगातार ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस पर हमलावर रहे. हिंदुत्व, भ्रष्टाचार और कथित तुष्टिकरण की राजनीति के मुद्दे पर उन्होंने बीजेपी के लिए माहौल तैयार किया. 2026 के चुनाव में बीजेपी की बड़ी जीत के पीछे भी शुभेंदु की रणनीति को अहम माना जा रहा है. खासकर हिंदू वोटों को एकजुट करने और तृणमूल के खिलाफ मजबूत संगठन खड़ा करने में उनकी बड़ी भूमिका रही.
भवानीपुर जैसे इलाके में ममता बनर्जी को कड़ी चुनौती देकर उन्होंने यह संदेश भी दिया कि तृणमूल को हराना संभव है. बीजेपी कार्यकर्ताओं के बीच भी शुभेंदु अब सबसे बड़े जननेता के रूप में उभर चुके हैं.
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