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भारत को बेस बनाकर अमेरिका कर सकता है प्रहार, क्वाड में चर्चा संभव.
आतंक के पैरोकार पाकिस्तान के साथ तालिबान पर बड़े एक्शन की प्लानिंग।
नई दिल्ली (ए/नेट डेस्क/टीवी चैनल्स) अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी के बाद वहां आतंकियो को काबू में रखने के लिए भारत की रणनीतिक भागीदारी कई देशों के लिए काफी अहम हो गई है। आतंकियों पर प्रहार के लिए अमेरिका भारत की मदद ले सकता है, इसके लिए वह बेस बनाने पर भी विचार कर रहा है। अमेरिका की ओर से भारत में बेस तलाशने की खबरों पर भारत की ओर से कोई पुष्टि या खंडन नहीं करना बताता है कि इस रणनीतिक मुद्दे पर अभी कोई भी पत्ते नही खोलना चाहता।
विदेश मंत्रालय का कहना है हम इन खबरों से अवगत हैं। हम तथ्यों का पता लगा रहे हैं और अधिक जानकारी प्राप्त कर रहे हैं। उधर रणनीतिक मामलों के जानकार मानते हैं कि भारत इतनी आसानी से बेस की अनुमति नहीं देगा। लेकिन बदली हुई परिस्थिति में चर्चा बहुत से विकल्पों पर होना संभव है क्योंकि आतंकवाद भारत, अमेरिका के लिए कोर मुद्दा है। भारत ने लगभग सभी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आतंकवाद को लेकर अपनी बात को फोकस में बनाए रखा है।
जानकारों का कहना है कि अमेरिका और रूस के शीर्ष सुरक्षा अधिकारियों का पिछले दिनों भारत दौरा साफ संकेत है कि इस इलाके की रणनीति को लेकर काफी कुछ पर्दे के पीछे चल रहा है। अफगानिस्तान की स्थिति पर भारत मे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल सुरक्षा व खुफिया एजेंसियों के जरिए लगातार इनपुट खंगाल रहे हैं और उच्च स्तर पर नजर बनी हुई है। भारत अभी अपने हितों को खंगाल रहा है। दरअसल, इस तरह की रिपोर्ट हैं कि अमेरिकी सरकार दूसरे देशों में स्टेजिंग एरिया या आसान शब्दों में बेस बनाने के लिए कोशिश कर रहा है। ताकि वो सात समंदर की दूरी से भी अफगानिस्तान में आतंकियों और उनके ठिकानों पर ओवर द होराइजऩ हमले कर सके। क्या भारत में भी अमेरिका ऐसा स्टेजिंग एरिया की तलाश में है? इस पूरे मामले को लेकर अमेरिकी विदेश मंत्री एंटोनी ब्लिंकन से अमेरिकी संसद में सवाल पूछे गए। इसके जवाब में ब्लिंकन ने विस्तृत जवाब नहीं दिया, लेकिन इस बात से इनकार भी नहीं किया। रिपब्लिकन के सांसद मार्क ग्रीन ने स्टेजिंग एरिया के लिए उत्तर पश्चिमी भारत को उपयुक्त बताया और कहा कि दोहा और बाकी इलाके अफगानिस्तान से बहुत दूर हैं। खबर यह भी है कि अफगानिस्तान से बाहर निकलने से पहले अमेरिका ने पाकिस्तान से मिलिट्री बेस को लेकर मांग की थी जिसके बाद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने सार्वजनिक तौर पर कहा था कि वो सीआईए को सीमा पार आतंक विरोधी अभियानों के लिए अपनी जमीन पर बेस बनाने की अनुमति नहीं देगा। हालांकि इस मामले को लेकर पाक ने तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं की है।
24 सितंबर को अमेरिकी राष्ट्रपति से मिल सकते हैं पीएम मोदी
उम्मीद की जा रही है कि प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी 24 सितंबर को अमेरिकी राष्ट्रपति जो बिडेन के साथ द्विपक्षीय बैठक करेंगे, इस मुलाकात के बाद ही व्हाइट हाउस में क्त्रष्ठ नेताओं की बैठक होगी, जिसमें अफगानिस्तान, इंडो-पैसिफिक, कोविड -19 महामारी और जलवाायु संकट जैसे संवेदनशील मामलों पर बात किया जाएगा। वाशिंगटन और नई दिल्ली स्थित अधिकारियों ने कहा कि मोदी सबसे पहले 23 सितंबर को अपने व्यापक रणनीतिक साझेदार जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ अलग-अलग द्विपक्षीय बैठक करेंगे। नाम न छापने की शर्त पर अधिकारियों ने बताया कि जापानी प्रधान मंत्री योशीहिदे सुगा और ऑस्ट्रेलियाई प्रधान मंत्री स्कॉट मॉरिसन के साथ, पीएम मोदी एक खुले, मुक्त, समृद्ध और नियम-आधारित हिंद-प्रशांत क्षेत्र के साझा उद्देश्य को आगे बढ़ाएंगे, क्योंकि भारत विभिन्न पहलों के माध्यम से अपनी भागीदारी बढ़ा रहा है। वहीं 11 सितंबर को नई दिल्ली में आयोजित पहली भारत-ऑस्ट्रेलिया वार्ता के साथ भारत ने अपने सभी तीन क्वाड भागीदारों के साथ टू-प्लस-टू संवाद किया है।
24 सितंबर को, मोदी पहले अमेरिकी उप राष्ट्रपति कमला हैरिस के साथ द्विपक्षीय वार्ता करेंगे और उसके बाद राष्ट्रपति जो बाइडेन के साथ व्यक्तिगत रूप से पहली बातचीत। जिसके बाद क्वाड समिट शुरू किया जाएगा। मिली जनकारी के अनुसार सम्मेलन में होने वाले सभी कार्यक्रम व्हाइट हाउस में होंगे।
20 सितंबर को अमेरिका के लिए रवाना हो रहे हैं क्करू
जिस तरह पीएम मोदी तीनों क्वाड पार्टनर्स के साथ द्विपक्षीय बैठक करेंगे, उसी तरह अन्य नेताओं के भी शिखर सम्मेलन में शामिल होने से पहले द्विपक्षीय बैठकें करने की उम्मीद है। विदेश मंत्री एस जयशंकर संयुक्त राष्ट्र महासभा में भाग लेने और क्त्रष्ठ समिट की आधारशिला तैयार करने के लिए 20 सितंबर को अमेरिका के लिए रवाना हो रहे हैं। क्वाड विदेश मंत्रियों के बीच कोई बैठक निर्धारित नहीं है। क्त्रष्ठ भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के बीच अनौपचारिक रणनीतिक वार्ता मंच है। इसका उद्देश्य इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में शांति और समन्वय स्थापित करना है। इसी वर्ष चारों देशों के नेता 12 मार्च को वर्चुअल माध्यम से आयोजित क्त्रष्ठ के पहले शिखर सम्मेलन में शामिल हुए।
भारत की जमीन का इस्तेमाल करने की इजाजत किसी को नहीं
भारत और अमेरिका के बीच एक दूसरे की सैन्य मदद को लेकर तीन तरह के समझौते हैं, दोनों देशों के बीच अफगानिस्तान के हालात को लेकर लगातार विमर्श भी हो रहा है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि भारत अमेरिका को अपनी धरती का इस्तेमाल अफगानिस्तान के खिलाफ खुलेआम करने देगा। विदेश मंत्रालय ने इस बारे में भारत का रुख गुरुवार को स्पष्ट किया। इस स्पष्टीकरण की जरूरत इसलिए पड़ी क्योंकि दो दिन पहले अमेरिकी संसद में अफगानिस्तान के मुद्दे पर सुनवाई के दौरान विदेश सचिव एंटनी ब्लिंकन ने जो बयान दिया था उससे यह संदेश गया था कि भारत और अमेरिका के बीच इस तरह की बातचीत हो रही है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची के मुताबिक, हमें कोई भी दबाव में नहीं ले सकता। मेरे ख्याल से हम दोनों (भारत व अमेरिका) एक दूसरे पर इस बारे में दबाव नहीं बना सकते। मैं विदेश मंत्री ब्लिंकन के बयान पर कुछ नहीं कहना चाहता, लेकिन जैसा मीडिया में बताया जा रहा है वैसा उन्होंने नहीं कहा है।
वैसे अफगानिस्तान में जो कुछ हो रहा है उसको लेकर हम अमेरिका के साथ लगातार संपर्क में हैं।' उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भारत और अमेरिका के बीच एक दूसरे की सैन्य मदद को लेकर तीन तरह के समझौते हैं। इसमें यह समझौता भी है कि दोनों देश एक दूसरे के सैन्य ठिकानों का आपसी समझ से इस्तेमाल कर सकते हैं।
भारत को यह बयान इसलिए देना पड़ा क्योंकि गुरुवार को कई राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय मीडिया में यह खबर आई कि अमेरिका भारतीय ठिकानों से अफगानिस्तान स्थित आतंकी ठिकानों को निशाना बनाने की सोच रहा है और इस बारे में दोनों देशों के बीच बातचीत हो रही है। असलियत में अमेरिकी संसद में सुनवाई के दौरान जब ब्लिंकन से यह पूछा गया था कि क्या अमेरिका भारत के साथ संपर्क में है कि किस तरह अफगानिस्तान के आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया जाए, तो उनका जबाव था कि मैं बस यह कहना चाहूंगा कि हम भारत के साथ लगातार करीबी स्तर पर बातचीत कर रहे हैं। इस दौरान उन्होंने पाकिस्तान के साथ अमेरिकी रिश्तों की पुर्नसमिक्षा करने की बात भी कही थी।
चीन-पाक के मंसूबों पर फिरेगा पानी! भारत में रॉकेट फोर्स होगी तैयार
अफगानिस्तान में चीन के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए सीडीएस जनरल बिपिन रावत ने बड़ी बात कही है। जनरल रावत ने आगाह करते हुए कहा है कि चीन बहुत आक्रामक हो रहा है और ईरान एवं तुर्की के साथ दोस्ताना रिश्ता कायम करने के बाद वह जल्द ही अफगानिस्तान में उतर जाएगा। सीडीएस ने बुधवार को कहा कि ऐसे में दो पड़ोसी दुश्मन देशों से निपटने के लिए भारत को एक एकीकृत राष्ट्रीय सुरक्षा तंत्र बनाने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि देश की सभी सुरक्षा जरूरतों को ध्यान में रखते हुए एक रॉकेट फोर्स बनाने के बारे में सोचा जा रहा है। इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में एक कार्यक्रम में शरीक होते हुए चीफ ऑफ डिफेंस स्टॉफ ने कहा कि चीनी सभ्यता पश्चिमी मुल्कों का मुकाबला करने के लिए इस्लामी सभ्यता के साथ हाथ मिला लेगी। रावत ने सैमुअल हंटिंग्टन की पुस्तक क्लैश ऑफ सिविलाइजेशन का हवाला देते हुए यह बात कही। उन्होंने आगे कहा, ऐसा होना जा रहा कि नहीं, इस बारे में समय ही बताएगा। लेकिन एक बात जो देखने में आ रही है है, वह यह है कि चीनी और इस्लामी सभ्यता करीब आ रही हैं। आप देख सकते हैं कि चीन अब ईरान में अपने दोस्त बना रहा है। वह तुर्की के साथ आ रहा है। उसका प्रभाव अफगानिस्तान में भी देखा जा रहा है। इसे देखते हुए समझा जा सकता है कि चीन बहुत जल्द अफगानिस्तान में दखल देना शुरू कर देगा।
इस बात का जिक्र करते हुए कि दुनिया ने जितना सोचा था उससे कम समय में ही चीन ने तरक्की कर ली है, उन्होंने कहा कि तालिबान के राज में अफगानिस्तान में चीजें कैसे बदलती हैं, इसे भारत को अभी देखना होगा। सीडीएस ने कहा, 'भविष्य में क्या है, इस बारे में हमें पता नहीं है। अफगानिस्तान में अभी और ऐसी चीजें और घटनाएं हो सकती हैं जिनके बारे में अभी सोचा नहीं गया है।'
पाकिस्तान पर निशाना साधते हुए जनरल ने कहा कि पड़ोसी मुल्क आने वाले दिनों में भारत के खिलाफ अपना 'छद्म युद्ध' जारी रखेगा। उन्होंने कहा, 'आज हम देख रहे हैं कि यह जम्मू-कश्मीर में हो रहा है। पाकिस्तानी एक बार फिर पंजाब में अपनी नापाक कोशिश कर रहे हैं। वे देश के अन्य हिस्सों में भी अपना आतंक का जाल फैलाना चाहते हैं।'
सीडीएस ने कहा कि अपनी सभी रक्षा जरूरतों को ध्यान में रखते हुए भारत एक 'रॉकेट फोर्स' बनाने के बारे में सोच रहा है। यह फोर्स सशस्त्र बलों एवं केंद्रीय बलों के बीच एक 'कड़ी' के रूप में काम करेगी। जनरल ने इस 'रॉकेट फोर्स' के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं दी। भविष्य की रक्षा चुनौतियों एवं युद्ध के तरीकों में होने वाले बदलाव को देखते हुए भारत पहले ही थियेटर कमान बनाने की दिशा में आगे बढ़ चुका है। स्पेस और साइबर युद्ध के लिए भी देश अपनी क्षमताओं को विकसित कर रहा है।
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