अंतरजातीय विवाह के समर्थन में RSS चीफ, राजनीति में सुधार का कारण बताया

दिल्ली। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने कहा है कि जाति आधारित राजनीति तभी खत्म होगी, जब समाज जातिगत पहचान से ऊपर उठेगा. उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण से समान नागरिक संहिता यानी यूसीसी तक, सरकार की नीतियों के क्रियान्वयन के लिए जनसहयोग को जरूरी बताया. मोहन भआगवत ने अलग-अलग धर्म और संप्रदाय के बीच सौहार्द की भी अपील की. वह गुरुवार को कर्नाटक के मैसुरु में संवाद सत्र में बोल रहे थे.
संघ प्रमुख ने कहा कि सामाजिक जीवन में समानता केवल नारों से नहीं, बल्कि व्यवहार से लागू होनी चाहिए. उन्होंने कहा कि समाज जाति को याद रखता है, इसलिए राजनेता उसका फायदा उठाते हैं. उनका वैध उद्देश्य वोट हासिल करना होता है. मोहन भागवत ने कहा कि अगर वे काम के आधार पर वोट नहीं ले सकते, तो जाति के आधार पर वोट लेंगे. राजनीति बदलने से पहले समाज को खुद बदलना होगा. उन्होंने कहा कि समाज को जाति भूलनी होगी, तब राजनीति अपने आप सुधर जाएगी. मोहन भागवत ने कहा कि लोगों से केवल यह मत कहिए कि जाति भूल जाओ. ऐसा कहने पर वे जाति भूलने की कोशिश में भी जाति को याद रखेंगे. ऐसा व्यवहार कीजिए मानो जाति का अस्तित्व ही नहीं है. उन्होंने अंतरजातीय सामाजिक संबंध, अंतरजातीय विवाह का समर्थन करते हुए 1942 में हुए महाराष्ट्र के एक अंतरजातीय विवाह का उल्लेख किया और कहा कि इसे व्यक्तिगत बंधन नहीं बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी के रूप में देखा जाना चाहिए.
संघ प्रमुख ने कहा कि महाराष्ट्र में हुए इस पहले अंतरजातीय विवाह के लिए दो प्रमुख व्यक्तियों ने शुभकामना संदेश भेजे थे. एक थे भीमराव आंबेडकर और दूसरे थे गुरु गोलवलकर. उन्होंने धार्मिक सौहार्द पर कहा कि अलग-अलग परंपराओं और तरीकों के बावजूद सभी धर्म सत्य की ओर ले जाने का प्रयास करते हैं. समुदाय और धर्म हमें रखने ही होंगे. मोहन भागवत ने संस्कृत के एक श्लोक का उल्लेख करते हुए कहा कि अलग-अलग रास्ते आखिरकार उसी मंजिल तक पहुंचते हैं, जैसे नदियां समुद्र में मिल जाती हैं. उन्होंने कहा कि धर्मों को यह समझना चाहिए कि मंजिल एक ही है और उनमें समन्वय और सहयोग होना चाहिए. मानवता के अस्तित्व के लिए यह जरूरी है. इसका कोई विकल्प नहीं है. मोहन भागवत ने हिंदू परंपराओं और आचरण पर बोलते हुए कहा कि रीति-रिवाज और संप्रदाय अलग हो सकते हैं, लेकिन धर्म आधारित व्यवहार ही सबसे महत्वपूर्ण है. उन्होंने कहा कि धर्म का उद्भव आचरण से होता है और संयम, अनुशासन, नैतिक व्यवहार उसके मूल तत्व हैं. हिंदू समाज को अपने आदर्श व्यवहार के जरिए अपनी परंपराओं को संरक्षित रखना चाहिए.
मोहन भागवत ने कहा कि भारत ने बार-बार आंतरिक विभाजनों के कारण अपनी स्वतंत्रता खोई है. उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय विकास और सामाजिक समरसता के लिए बंधुत्व की भावना बहुत जरूरी है. डॉक्टर आंबेडकर ने चेतावनी दी थी कि हम इसी तरह लड़ते रहे, तो अपनी स्वतंत्रता की रक्षा नहीं कर पाएंगे. मोहन भागवत ने कहा कि संविधान भी हमसे भावनात्मक एकता को बढ़ावा देने के लिए कहता है. वह भावना क्या है? यह भावना कि हम सब एक हैं. भारतीय सभ्यता समाज और राष्ट्र को पश्चिमी दृष्टिकोण से अलग तरीके से देखती है. उन्होंने कहा कि यह सार्वभौमिक एकता के सिद्धांत पर आधारित है. भारतीय समाज पीढ़ियों से साथ रहने वाले लोगों के साझा उद्देश्य और भावनात्मक संबंधों से विकसित होता है. मोहन भागवत ने स्वामी विवेकानंद का उल्लेख करते हुए कहा कि हर राष्ट्र के पास दुनिया को देने के लिए एक संदेश होता है. हर राष्ट्र का एक मिशन होता है और हर राष्ट्र की एक नियति होती है, जिसे उसे पूरा करना होता है. उन्होंने कहा कि भारत में राष्ट्र की अवधारणा केवल राज्य पर नहीं, बल्कि लोगों और भूमि के बीच संबंध पर आधारित है.





