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रबी सीजन से पहले किसानों को राहत, खाद संकट से निपटने की तैयारी

Tulsi Rao
30 Sept 2026 7:40 AM IST
रबी सीजन से पहले किसानों को राहत, खाद संकट से निपटने की तैयारी
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आगामी रबी सीजन 2026-27 से पहले किसानों के लिए राहत की खबर है। केंद्र सरकार ने खाद की उपलब्धता को लेकर भरोसा जताया है। राष्ट्रीय कृषि सम्मेलन रबी अभियान 2026-27 में उर्वरक विभाग ने बताया कि रबी सीजन की शुरुआत में देश में प्रमुख उर्वरकों का शुरुआती स्टॉक अब तक के सबसे ऊंचे स्तर पर रहने की संभावना है। सरकार ने राज्यों को उनकी जरूरत के अनुसार खाद की आपूर्ति सुनिश्चित करने की बात कही है।

मंगलवार 29 सितंबर को आयोजित सम्मेलन में उर्वरक विभाग ने खरीफ 2026 के दौरान खाद की उपलब्धता और वितरण की स्थिति की जानकारी दी। विभाग के मुताबिक वैश्विक स्तर पर चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों के बावजूद राज्यों ने खाद वितरण का बेहतर प्रबंधन किया। इसके साथ ही उर्वरकों के अवैध डायवर्जन को रोकने के लिए भी कदम उठाए गए।

1 अप्रैल से 27 सितंबर 2026 के बीच देश में यूरिया की मौसमी जरूरत 190.32 लाख मीट्रिक टन थी, जबकि उपलब्धता 249.69 लाख मीट्रिक टन रही। इस अवधि में DBT के जरिए 182.20 लाख मीट्रिक टन यूरिया की बिक्री हुई। 27 सितंबर तक राज्यों के पास 67.51 लाख मीट्रिक टन यूरिया का स्टॉक मौजूद था, जबकि देश में कुल स्टॉक 81.39 लाख मीट्रिक टन रहा।

DAP की जरूरत 56.23 लाख मीट्रिक टन के मुकाबले उपलब्धता 69.47 लाख मीट्रिक टन रही। DBT के जरिए 46 लाख मीट्रिक टन DAP की बिक्री हुई। राज्यों के पास 23.48 लाख मीट्रिक टन और देशभर में कुल 29.21 लाख मीट्रिक टन DAP का स्टॉक मौजूद रहा।

MOP की मौसमी जरूरत 17.57 लाख मीट्रिक टन थी, जबकि उपलब्धता 19.56 लाख मीट्रिक टन रही। इसी तरह NPKS की जरूरत 84.99 लाख मीट्रिक टन के मुकाबले उपलब्धता 108.24 लाख मीट्रिक टन रही। SSP की उपलब्धता भी जरूरत से अधिक दर्ज की गई।

उर्वरक विभाग के अनुमान के मुताबिक रबी 2026-27 की शुरुआत में देश में यूरिया का स्टॉक 83.35 लाख मीट्रिक टन रहने की उम्मीद है। DAP का शुरुआती स्टॉक 30.30 लाख मीट्रिक टन और NPKS का स्टॉक 56.58 लाख मीट्रिक टन रह सकता है। पिछले रबी सीजन 2025-26 की शुरुआत में यूरिया का स्टॉक 54.08 लाख मीट्रिक टन था।

हालांकि पश्चिम एशिया में जारी संकट ने उर्वरक क्षेत्र की लागत बढ़ा दी है। यूरिया उत्पादन में इस्तेमाल होने वाली प्राकृतिक गैस की आपूर्ति प्रभावित हुई है। युद्ध से पहले गैस की कीमत करीब 10 डॉलर प्रति MMBTU थी, जो बाद में बढ़कर लगभग 28 से 29 डॉलर प्रति MMBTU तक पहुंच गई। इसके बावजूद देश के 32 यूरिया प्लांट्स ने खरीफ 2026 के दौरान 149 लाख मीट्रिक टन यूरिया का उत्पादन किया।

फॉस्फेट आधारित उर्वरकों के उत्पादन पर भी वैश्विक संकट का असर पड़ा है। फरवरी 2026 में सल्फर की कीमत 532 डॉलर प्रति टन थी, जो बढ़कर करीब 1,050 डॉलर प्रति टन पहुंच गई। फॉस्फोरिक एसिड की कीमत भी 1,290 डॉलर प्रति टन से बढ़कर 1,700 डॉलर प्रति टन हो गई। इसके चलते घरेलू NPKS उत्पादन पिछले साल के मुकाबले 26 लाख मीट्रिक टन कम रहा।

DAP की आयात और उत्पादन लागत में भी तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई। युद्ध से पहले इसकी लागत लगभग 681 डॉलर प्रति टन थी, जो बढ़कर 940 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गई। इसके बावजूद सरकार ने घरेलू उत्पादन और आयात जारी रखा है।

कच्चे माल की बढ़ती कीमतों के बीच सरकार की सब्सिडी भी बढ़ी है। यूरिया पर प्रति बोरी अनुमानित सब्सिडी करीब 1,350 रुपये से बढ़कर लगभग 2,775 रुपये हो गई है। DAP पर प्रति बोरी सब्सिडी 2,192 रुपये से बढ़कर करीब 3,523 रुपये पहुंच गई है।

राष्ट्रीय कृषि सम्मेलन में राज्यों को खाद के संतुलित इस्तेमाल पर जोर देने को कहा गया। साथ ही खाद की अवैध डायवर्जन रोकने और जैविक एवं प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के निर्देश दिए गए। सरकार का कहना है कि वैश्विक चुनौतियों के बावजूद रबी 2026-27 के दौरान किसानों को जरूरत के अनुसार खाद उपलब्ध कराने की पूरी तैयारी की गई है।

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