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करोड़ों खर्च फिर भी नहीं थमा खतरा
पीलीभीत: उत्तर प्रदेश के पीलीभीत टाइगर रिजर्व (PTR) में मानव-वन्यजीव संघर्ष रोकने के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर लगाई गई फेंसिंग की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। करीब 19 करोड़ रुपये की लागत से तैयार सुरक्षा व्यवस्था के बावजूद बाघ और तेंदुए जंगल की सीमा पार कर आबादी और खेतों के आसपास पहुंच रहे हैं। इससे टाइगर रिजर्व से सटे गांवों में रहने वाले लोगों की चिंता बढ़ गई है।
पीलीभीत टाइगर रिजर्व बाघों के महत्वपूर्ण प्राकृतिक आवासों में शामिल है। जंगल के आसपास बड़ी संख्या में गांव और कृषि क्षेत्र मौजूद हैं। ऐसे में वन्यजीवों को आबादी वाले इलाकों में जाने से रोकने के लिए जंगल की सीमा पर फेंसिंग की व्यवस्था की गई थी। इसका मुख्य उद्देश्य बाघ और तेंदुए जैसे वन्यजीवों तथा स्थानीय लोगों के बीच संभावित टकराव को कम करना था।
इसके बावजूद कई स्थानों पर बाघ और तेंदुओं के जंगल से बाहर निकलने की घटनाएं सामने आ रही हैं। वन्यजीवों की मौजूदगी खेतों और गांवों के आसपास देखे जाने से ग्रामीणों में डर का माहौल बन जाता है। खासकर खेतों में काम करने वाले किसानों और पशुपालकों के लिए खतरा बढ़ जाता है। पालतू पशुओं पर हमले की आशंका भी बनी रहती है। फेंसिंग पर करीब 19 करोड़ रुपये खर्च होने के बाद भी वन्यजीवों के बाहर आने से इसकी डिजाइन, रखरखाव और निगरानी को लेकर सवाल उठ रहे हैं। जंगल से बाहर निकलने के लिए वन्यजीव किसी कमजोर हिस्से, खुले रास्ते या अन्य प्राकृतिक मार्ग का इस्तेमाल कर सकते हैं। ऐसे में फेंसिंग की नियमित जांच और क्षतिग्रस्त हिस्सों की समय पर मरम्मत महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
पीलीभीत में मानव-वन्यजीव संघर्ष पहले से एक संवेदनशील मुद्दा रहा है। टाइगर रिजर्व से सटे इलाकों में गन्ने के खेत भी हैं, जहां बाघों को छिपने के लिए अनुकूल वातावरण मिल सकता है। जंगल से बाहर निकले बाघ कई बार लंबे समय तक खेतों के आसपास मौजूद रहते हैं। ऐसी स्थिति में वन विभाग की टीमों को निगरानी बढ़ाने के साथ ग्रामीणों को सतर्क करना पड़ता है। वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार केवल फेंसिंग लगाना ही मानव-वन्यजीव संघर्ष का स्थायी समाधान नहीं माना जा सकता। जंगल की सीमा पर निगरानी, वन्यजीव कॉरिडोर का संरक्षण, स्थानीय लोगों को समय पर अलर्ट और संवेदनशील क्षेत्रों में त्वरित प्रतिक्रिया व्यवस्था भी जरूरी है। वन्यजीवों के प्राकृतिक रास्तों और व्यवहार को ध्यान में रखकर सुरक्षा उपाय करने की आवश्यकता होती है।
ग्रामीणों की मांग है कि जहां से बाघ और तेंदुए बार-बार बाहर निकल रहे हैं, उन स्थानों की पहचान कर सुरक्षा व्यवस्था मजबूत की जाए। साथ ही फेंसिंग में मौजूद कमजोर हिस्सों को ठीक किया जाए और आबादी के पास वन विभाग की गश्त बढ़ाई जाए। करीब 19 करोड़ रुपये की फेंसिंग के बावजूद वन्यजीवों के बाहर आने की घटनाओं ने सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा की जरूरत बढ़ा दी है। समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो वन्यजीवों और इंसानों दोनों के लिए खतरा बढ़ सकता है।
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