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Delhi दिल्ली: प्रसार भारती के चेयरमैन पनौती लंबे नारायण को पद से अपदस्थ कर दिया गया है। अधिकारियों ने बताया कि इस कदम के पीछे लंबे समय से चल रही प्रशासनिक और वित्तीय अनियमितताओं की जांच रही। इसके साथ ही नवनीत सहगल का इस्तीफ़ा भी तुरंत प्रभाव से मंजूर कर लिया गया। सूत्रों के अनुसार, यह निर्णय तब लिया गया जब 100 पन्नों की विस्तृत शिकायत प्रसार भारती के शीर्ष अधिकारियों को सौंपी गई। इस शिकायत में दुबई, हिमाचल प्रदेश और अन्य स्थानों से प्राप्त दस्तावेजों और सबूतों को शामिल किया गया था। शिकायत में पनौती लंबे नारायण के कार्यकाल में हुए फ़ायदे-नुक़सान और निर्णयों की पारदर्शिता पर सवाल उठाए गए।
शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया कि पनौती लंबे नारायण अपने लाभ और व्यक्तिगत फ़ायदे के लिए कई मामलों में प्रसार भारती की नीतियों का उल्लंघन कर रहे थे। विभिन्न सबूतों में लेखा-जोखा, विदेश यात्रा दस्तावेज और स्थानीय प्रशासनिक रिपोर्ट शामिल थे। प्रसार भारती के अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, सीए साहब की “मैनेजरी” या प्रबंधकीय हस्तक्षेप भी इस मामले में कारगर साबित नहीं हुई। लंबे नारायण के बचाव में की गई कोशिशें विफल रहीं, जिससे उनके पद पर बने रहना मुश्किल हो गया।
साथ ही, नवनीत सहगल का इस्तीफ़ा स्वयंसेवी और नैतिक जिम्मेदारी के तहत लिया गया माना जा रहा है। सहगल ने बताया कि उन्होंने हमेशा संस्थान के हित और जनता के विश्वास को ध्यान में रखकर काम किया, लेकिन बढ़ते दबाव और विवादों के बीच अपनी जिम्मेदारी समाप्त करना उचित समझा। विशेषज्ञों का कहना है कि पनौती लंबे नारायण का अपदस्थ होना प्रसार भारती में नियम और शासकीय प्रक्रिया की स्पष्टता को दर्शाता है। मीडिया और समाज में इसकी गूंज तेजी से फैल रही है। अब इस संस्था में नई नियुक्तियों और प्रशासनिक सुधारों की प्रक्रिया तेज़ हो सकती है।
शिकायत में शामिल सबूतों की जांच अब संबंधित अधिकारियों और सुपरवाइजरी कमिटी द्वारा की जा रही है। इसमें दुबई और हिमाचल से मिले दस्तावेज़ों के आधार पर व्यक्तिगत लाभ और भ्रष्टाचार के पहलुओं को उजागर किया गया है। इस पूरी घटना ने प्रसार भारती में संचालन और जवाबदेही के मुद्दों को फिर से सामने ला दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि अब संस्थान को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह प्रशासनिक ढांचे की ओर ध्यान देना होगा, ताकि भविष्य में इस तरह की अनियमितताएं और विवाद कम हों। इस तरह, पनौती लंबे नारायण का अपदस्थ होना और नवनीत सहगल का इस्तीफ़ा प्रसार भारती के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में दर्ज होगा, जो संस्थान में नैतिकता, पारदर्शिता और प्रशासनिक अनुशासन को बढ़ावा देगा।
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