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रायपुर: देश में संबलपुरी साड़ी ओडिशा की पहचान है। मगर, छत्तीसगढ़ में भी संबलपुरी साड़ियों का निर्माण हो रहा है। इस काम में बड़ी संख्या में हाथकरघा उद्योग से जुड़े कामगार लगे हुए हैं।
राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में हाथकरघा उद्योग का रोजगार प्रदान करने की दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थान है। राज्य में यह उद्योग हाथकरघा बुनाई के परंपरागत धरोहर को अक्षुण्ण बनाए रखने के साथ ही बुनकर समुदाय के सामाजिक, सांस्कृतिक परंपराओं को प्रतिबिंबित करता है। हाथकरघा उद्योग एक मुख्य कुटीर उद्योग के रूप में स्थापित है। हाथकरघा उद्योग में रोजगार की विपुल संभावनाओं और हाथकरघा बुनाई की समृद्ध परंपरा, हाथकरघा बुनकरों और हाथकरघा उद्योग को और अधिक बढ़ावा देने के लिए शासन द्वारा विभिन्न योजनाएं एवं कार्यक्रम संचालित की जा रही है। पूरे छत्तीसगढ़ के साथ ही महासमुंद ज़िले में सैकड़ों परिवार बुनकर एवं महिलाओं को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से बुनाई एवं सिलाई के माध्यम से रोजगार मिल रहा है। पड़ोसी राज्य ओडिशा के अलावा महासमुंद जिले के कुछ हिस्सों में भी संबलपुरी साड़ी का उत्पादन किया जाता है। सरायपाली क्षेत्र के ग्राम अमरकोट, कसडोल सहित कई गांवों के बुनकर परिवार मिलकर हाथ से बुनाई कर संबलपुरी साड़ी बनाने का काम करते हैं।
सरायपाली के ग्राम सिंघोड़ा के संजय मेहेर 40 साल से यह परंपरागत व्यवसाय का कार्य कर रहे हैं। उन्होंने पढ़ाई के दौरान 14 वर्ष की उम्र से बुनकर का काम शुरू किया था। आज उन्हें अपने इस काम में महारथ हासिल है। उन्होंने बुनकर काम को बखूबी कर अपनी आर्थिक स्थिति पहले से बहुत मज़बूत कर ली है। वह कहते हैं कि अपने बुनकर के हुनर से ज़मीन, मकान बनवा लिया है। उनके दादा और पिता भी इसी कार्य से जुड़े थे। तब वह ओड़िया साड़ी, दो नग टाई-डाई साड़ी बुनकर घूम-घूमकर शहर और गांव में बेचा करते थे।
उन्होंने बताया अब वह 1000 से 10000 टाई-डाई तक की विभिन्न डिजाइन की हाथ से बुनी संबलपुरी साड़ी बनाने का काम करते हैं। इस प्रक्रिया से साड़ी बनने में एक सप्ताह तक का समय लग जाता है। हाथ से बनी संबलपुरी साडियां हजारों रुपए में बाजार में बिकती हैं। आज पहले के मुक़ाबले साड़ी की क़ीमत अच्छी मिल रही है। आज 2500-3000 रुपये तक एक साड़ी पर आसानी से मिल जाती है। अब कहीं शहर, गांव में बिक्री के लिए नहीं घूमना पड़ता। आसानी से यहीं से साड़ी बिक जाती है। अब यह कला न केवल सरायपाली के लोगों के जीविकोपार्जन का साधन है, बल्कि एक पूरे इलाके की अलग पहचान भी बन गया है।
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