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सोरेन सरकार पर मिलीभगत के आरोप
झारखंड। आदिवासी बेटी निशा भगत की मौत का मामला लगातार गंभीर होता जा रहा है। अपनी बेटी को न्याय दिलाने के लिए पिता ने FIR दर्ज कराई है। इसके बावजूद 48 घंटे बीत जाने के बाद भी किसी आरोपी की गिरफ्तारी नहीं होने पर सवाल उठाए जा रहे हैं। मामले को लेकर झारखंड की हेमंत सोरेन सरकार पर भी निशाना साधा गया है। आरोप लगाया गया है कि आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं होना सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
निशा भगत की मौत के बाद उनके परिवार की ओर से न्याय की मांग की जा रही है। बेटी को खोने के बाद पिता ने मामले में प्राथमिकी दर्ज कराकर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग उठाई है। परिवार की ओर से FIR दर्ज कराना इस मामले में न्याय पाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। अब परिवार की निगाहें पुलिस की कार्रवाई पर टिकी हैं।
48 घंटे बाद भी गिरफ्तारी नहीं होने पर उठे सवाल
इस मामले में सबसे बड़ा सवाल आरोपियों की गिरफ्तारी को लेकर उठ रहा है। FIR दर्ज होने के 48 घंटे बाद भी किसी आरोपी को गिरफ्तार नहीं किए जाने पर सरकार और संबंधित कार्रवाई पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। सवाल उठाया जा रहा है कि जब मृतक बेटी के पिता ने खुद आगे आकर FIR दर्ज कराई है, तो अब तक आरोपियों के खिलाफ गिरफ्तारी की कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
निशा भगत के परिवार को न्याय दिलाने की मांग के बीच यह मुद्दा भी उठाया जा रहा है कि मामले में कार्रवाई में देरी क्यों हो रही है। आखिर किन परिस्थितियों में आरोपियों की गिरफ्तारी नहीं हो सकी है और पीड़ित परिवार को न्याय के लिए कितना इंतजार करना पड़ेगा?
सोरेन सरकार पर लगाया मिलीभगत का आरोप
मामले को लेकर हेमंत सोरेन सरकार पर भी सीधा हमला बोला गया है। आरोप लगाया गया है कि 48 घंटे बीत जाने के बाद भी किसी अपराधी की गिरफ्तारी नहीं होना अपराधियों के साथ सरकार की कथित मिलीभगत को दर्शाता है। इस टिप्पणी के जरिए राज्य सरकार से जवाबदेही तय करने और आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई है।
निशा भगत के पिता द्वारा दर्ज कराई गई FIR के बाद अब इस मामले में पुलिस की कार्रवाई महत्वपूर्ण हो गई है। परिवार की मांग है कि उनकी बेटी को न्याय मिले और मामले में शामिल आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई हो। सवाल यही है कि FIR दर्ज होने के बावजूद गिरफ्तारी नहीं होने की स्थिति कब बदलेगी और पीड़ित परिवार को न्याय कब मिलेगा।
निशा भगत की मौत का मामला अब केवल एक परिवार की न्याय की लड़ाई तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि राज्य में कानून व्यवस्था और पीड़ित परिवारों को न्याय दिलाने की जिम्मेदारी को लेकर भी सवाल खड़े कर रहा है।
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