भारत
डीआरडीओ के पूर्व वैज्ञानिक की जमानत पर फैसला सुरक्षित
jantaserishta.com
16 March 2026 5:32 PM IST

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मुंबई: रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) के पूर्व वैज्ञानिक डॉ. प्रदीप कुरुलकर की जमानत याचिका पर सुनवाई के बाद बॉम्बे हाई कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। अदालत में मामले को लेकर अभियोजन और बचाव पक्ष के बीच लंबी बहस हुई, जिसके बाद कोर्ट ने आदेश बाद में सुनाने का निर्णय लिया।
दरअसल, डॉ. प्रदीप कुरुलकर पर पाकिस्तान के लिए जासूसी करने का गंभीर आरोप है। महाराष्ट्र आतंकवाद निरोधक दस्ता (एटीएस) ने मई 2023 में उन्हें गिरफ्तार किया था। जांच एजेंसियों का आरोप है कि उन्होंने पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी से जुड़ी एक महिला एजेंट के संपर्क में आकर देश की रक्षा से जुड़ी संवेदनशील जानकारी साझा की। जांच के मुताबिक, कुरुलकर सोशल मीडिया और मैसेजिंग प्लेटफॉर्म के जरिए एक महिला के संपर्क में आए थे। बताया गया कि वह महिला खुद को डिफेंस रिसर्च में रुचि रखने वाली बताती थी, लेकिन बाद में जांच में सामने आया कि उसका संबंध पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी से हो सकता है।
एटीएस के अनुसार, बातचीत के दौरान कुरुलकर ने भारत के कई संवेदनशील रक्षा प्रोजेक्ट्स से जुड़ी जानकारी साझा की। इनमें मिसाइल और रक्षा प्रणालियों से संबंधित तकनीकी जानकारियां भी शामिल होने की आशंका जताई गई है। जांच एजेंसियों का कहना है कि बातचीत में कई बार बेहद गोपनीय विषयों पर चर्चा हुई, जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से गंभीर मामला है।
सुनवाई के दौरान एटीएस ने अदालत में कहा कि यह मामला देश की सुरक्षा से जुड़ा अत्यंत संवेदनशील मामला है। एजेंसी का कहना है कि कुरुलकर जिस पद पर कार्यरत थे, वहां से उन्हें कई महत्वपूर्ण रक्षा परियोजनाओं तक पहुंच थी। एटीएस ने यह भी दलील दी कि जांच अभी पूरी तरह पूरी नहीं हुई है और कई डिजिटल सबूतों की जांच जारी है। ऐसे में आरोपी को जमानत देने से जांच प्रभावित हो सकती है। वहीं, कुरुलकर की ओर से पेश वकीलों ने अदालत में कहा कि उनके मुवक्किल के खिलाफ लगाए गए आरोप बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए गए हैं। बचाव पक्ष का दावा है कि बातचीत में ऐसी कोई जानकारी साझा नहीं की गई जो आधिकारिक रूप से गोपनीय श्रेणी में आती हो।
बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि कुरुलकर लंबे समय तक देश के रक्षा अनुसंधान से जुड़े रहे हैं और उनका पूरा करियर बेदाग रहा है, इसलिए उन्हें जमानत दी जानी चाहिए। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद बॉम्बे हाई कोर्ट ने फिलहाल इस मामले में आदेश सुरक्षित रख लिया है।
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