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78 रुपये की दवा पर 2,850 रुपये का MRP! सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से पूछा- मरीजों को क्या फायदा?
jantaserishta.com
12 Oct 2026 6:06 PM IST

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पूरे दवा क्षेत्र में मूल्य नियंत्रण की समीक्षा चाहता है कोर्ट
सारांश: केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि कैंसर की दवाओं पर ट्रेड मार्जिन को अधिकतम खुदरा मूल्य यानी एमआरपी के 30 प्रतिशत तक सीमित किया जाएगा। अदालत ने दवाओं की खरीद कीमत और एमआरपी के बीच बड़े अंतर पर चिंता जताते हुए मूल्य निर्धारण व्यवस्था की व्यापक समीक्षा की जरूरत बताई। सुनवाई के दौरान हार्ट स्टेंट और एक अन्य दवा की कीमतों के उदाहरण देकर सरकार से सवाल किए गए। मामले की अगली सुनवाई 27 अक्टूबर को होगी।
कैंसर के इलाज में इस्तेमाल ....
कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाओं की कीमतों को लेकर केंद्र सरकार ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में अपनी योजना की जानकारी दी। सरकार ने बताया कि इन दवाओं पर ट्रेड मार्जिन को एमआरपी के अधिकतम 30 प्रतिशत तक सीमित करने का फैसला किया गया है।
सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ को बताया कि जल्द ही उन कैंसर की दवाओं की सूची जारी की जाएगी, जिन पर यह नियम लागू होगा। जरूरत और बाजार की स्थिति को देखते हुए समय-समय पर इस सूची में दूसरी दवाएं भी शामिल की जा सकती हैं।
हालांकि, सरकार ने स्पष्ट किया कि कम कीमत वाली दवाओं को इस प्रस्तावित व्यवस्था से बाहर रखा जाएगा। इस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल कैंसर की दवाओं पर सीमा लगाने से दवाओं की कीमतों से जुड़ी सभी समस्याओं का समाधान नहीं होगा।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने दवाओं की वास्तविक खरीद कीमत और पैकेट पर लिखे अधिकतम खुदरा मूल्य के बीच बड़े अंतर पर सवाल उठाए। अदालत का मानना था कि इस तरह का अंतर मरीजों के लिए इलाज का खर्च बढ़ा सकता है।
पीठ ने भारत में बनने वाले एक हार्ट स्टेंट का उदाहरण देते हुए कहा कि खुदरा विक्रेताओं को यह उपकरण लगभग 5,000 रुपये में मिलता है, जबकि इसका एमआरपी 25,000 रुपये दर्ज है। अदालत ने पूछा कि कीमत में पांच गुना अंतर रखने की वजह क्या है।
इस पर तुषार मेहता ने बताया कि हार्ट स्टेंट पहले से ही मूल्य नियंत्रण के दायरे में आते हैं। इसके बावजूद अदालत ने व्यापक स्तर पर कीमतों को नियंत्रित करने की जरूरत पर जोर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान...
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान एक दूसरी दवा का उदाहरण भी सामने रखा। अदालत के मुताबिक, इस दवा की स्टॉकिस्ट के स्तर पर कीमत 78.29 रुपये है, जबकि उसका अधिकतम खुदरा मूल्य 2,850 रुपये है।
पीठ ने केंद्र सरकार से पूछा कि जब किसी दवा की शुरुआती कीमत और एमआरपी के बीच इतना बड़ा अंतर हो, तो इससे मरीजों को क्या लाभ मिलता है। अदालत ने यह भी जानना चाहा कि मौजूदा व्यवस्था आम लोगों को दवाएं उचित कीमत पर उपलब्ध कराने में कितनी प्रभावी है।
अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने सरकार का पक्ष रखते हुए कहा कि दवाओं की कीमत तय करते समय उनकी उपलब्धता और बाजार की परिस्थितियों को भी ध्यान में रखना पड़ता है। उन्होंने कहा कि दवाओं को सस्ता बनाने और उनकी पर्याप्त आपूर्ति बनाए रखने के बीच संतुलन जरूरी है।
पूरे दवा क्षेत्र में मूल्य नियंत्रण की समीक्षा चाहता है कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने सवाल किया कि मूल्य नियंत्रण का दायरा केवल कुछ दवाओं तक सीमित रखने के बजाय व्यापक व्यवस्था पर विचार क्यों नहीं किया जा सकता। अदालत ने ड्रग्स प्राइस कंट्रोल ऑर्डर, 2013 का उल्लेख करते हुए यह भी पूछा कि इसके तहत आने वाली दवाएं तय ट्रेड मार्जिन के बावजूद ग्राहकों तक किस तरह पहुंचती हैं।
इस मामले में दाखिल जनहित याचिकाओं में दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने, मूल्य नियंत्रण से बाहर दवाओं की शुरुआती कीमत तय करने, चिकित्सा उपकरणों और जेनेरिक दवाओं की व्यवस्था में सुधार तथा डॉक्टरों के पर्चे पर दवाएं लिखने से जुड़े नियमों को नियंत्रित करने की मांग की गई है।
अदालत इससे पहले भी दवाओं के एमआरपी और खुदरा खरीद कीमत के अंतर पर सवाल उठा चुकी है। 22 सितंबर को एक जरूरी कैंसर की दवा की कीमतों में दस गुना अंतर को लेकर पीठ ने कड़ी नाराजगी जताई थी। 29 सितंबर को भी अदालत ने पूछा था कि सभी दवाओं पर एक समान ट्रेड मार्जिन सीमा क्यों नहीं लागू की जा सकती।
पीठ ने कॉरपोरेट अस्पतालों में मरीजों को अस्पताल के भीतर स्थित फार्मेसी से ही दवाएं खरीदने के लिए कहे जाने की प्रथा पर भी चिंता जताई थी।
दवाओं की कीमतों पर सुनवाई के बीच ....
दवाओं की कीमतों पर सुनवाई के बीच फार्मा कंपनियों की मार्केटिंग गतिविधियां भी चर्चा में हैं। सुप्रीम कोर्ट ने एक अलग मामले में केंद्र सरकार को इस विषय की समीक्षा के लिए समिति बनाने का निर्देश दिया है।
समिति यह देखेगी कि डॉक्टरों को दवाओं के प्रचार के लिए दिए जाने वाले उपहार, आतिथ्य और अन्य लाभों पर किस तरह के नियम होने चाहिए। संबंधित पक्षों के सुझाव और आपत्तियां सुनने के बाद उसे यह सिफारिश करनी है कि इन गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए कानूनी व्यवस्था जरूरी है या नहीं।
दवाओं की कीमतों से जुड़े मौजूदा मामले में सुप्रीम कोर्ट अब 27 अक्टूबर को अगली सुनवाई करेगा।
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