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हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: चुनाव लड़ने के लिए नौकरी छोड़ने वाला कर्मचारी हार के बाद वापस..?
jantaserishta.com
12 Sept 2026 1:41 PM IST

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चुनाव लड़ने के लिए छोड़ी थी सरकारी नौकरी.
नई दिल्ली: सरकारी नौकरी छोड़कर चुनावी मैदान में उतरने वाले कर्मचारियों और अधिकारियों के लिए राजस्थान हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ कर दिया है कि अगर कोई सरकारी कर्मचारी अपनी इच्छा से इस्तीफा देकर चुनाव लड़ता है, तो चुनाव का नतीजा उसके पक्ष में आए या खिलाफ, वह केवल चुनाव हार जाने के आधार पर दोबारा सरकारी सेवा में लौटने का अधिकार नहीं मांग सकता। हाईकोर्ट ने कहा कि चुनाव में हार को इस्तीफा वापस लेने के लिए नियमों में बताई गई बाध्यकारी परिस्थिति नहीं माना जा सकता।
यह फैसला जस्टिस इंद्रजीत सिंह और जस्टिस संदीप तनेजा की खंडपीठ ने नीरज बिश्नोई की याचिका पर सुनाया। अदालत ने उनकी याचिका खारिज करते हुए सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल यानी CAT की जयपुर बेंच के फैसले को भी बरकरार रखा।
चुनाव लड़ने के लिए छोड़ी थी सरकारी नौकरी
मामला नॉर्थ वेस्टर्न रेलवे में सीनियर ऑडिटर के पद पर कार्यरत रहे नीरज बिश्नोई से जुड़ा है। उन्होंने राजस्थान विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए 10 अक्टूबर 2023 को अपनी सरकारी नौकरी से इस्तीफा दिया था। रेलवे विभाग ने उनका इस्तीफा 1 नवंबर 2023 से स्वीकार कर लिया।
इस्तीफा स्वीकार होने के बाद नीरज बिश्नोई ने चूरू जिले की रतनगढ़ विधानसभा सीट से बहुजन समाज पार्टी यानी BSP के टिकट पर चुनाव लड़ा। हालांकि, चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा।
चुनाव परिणाम आने के बाद उन्होंने 1 जनवरी 2024 को विभाग के सामने अपना इस्तीफा वापस लेने और फिर से सरकारी सेवा में बहाल किए जाने का अनुरोध किया। लेकिन विभाग ने 29 जनवरी 2024 को उनकी मांग को स्वीकार नहीं किया। इसके बाद भी जब उनकी मांग पर राहत नहीं मिली, तो उन्होंने न्यायिक रास्ता अपनाया।
90 दिन की अवधि का दिया हवाला
याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में दलील दी गई कि उन्होंने इस्तीफा वापस लेने के लिए आवेदन निर्धारित 90 दिन की अवधि के भीतर ही कर दिया था। उनका कहना था कि इस्तीफा देते समय उन्हें इस बात की पूरी जानकारी नहीं थी कि नौकरी छोड़ने से उनके पेंशन और रिटायरमेंट से जुड़े लाभों पर क्या असर पड़ेगा।
याचिकाकर्ता के मुताबिक, चुनाव हारने के बाद उन्हें पेंशन और दूसरे सेवानिवृत्ति लाभ नहीं मिलने की स्थिति का पता चला। इसी वजह से उन्होंने इस्तीफा वापस लेने का अनुरोध किया और इसे परिस्थितियों में बदलाव के तौर पर देखने की मांग की। उनकी दलील थी कि जब इस्तीफा वापस लेने के लिए आवेदन नियमों में तय समय के भीतर किया गया है, तो परिस्थितियों में बदलाव को देखते हुए उन्हें दोबारा सरकारी सेवा में आने का अवसर दिया जाना चाहिए।
विभाग ने कहा- सोच-समझकर लिया था फैसला
दूसरी तरफ रेलवे विभाग ने याचिका का विरोध किया। विभाग की ओर से कहा गया कि नीरज बिश्नोई ने किसी मजबूरी में नहीं, बल्कि विधानसभा चुनाव लड़ने के अपने फैसले के तहत स्वेच्छा से नौकरी छोड़ी थी।
विभाग का तर्क था कि उन्होंने इस्तीफा देने के पीछे जिस उद्देश्य का उल्लेख किया था, उस पर अमल भी किया। उन्होंने चुनाव लड़ा। ऐसे में चुनाव में हार के बाद अपने पुराने फैसले से पीछे हटकर दोबारा सरकारी नौकरी का दावा नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी। अदालत ने माना कि चुनाव में हार के बाद पेंशन और रिटायरमेंट लाभों पर पड़ने वाले प्रभाव का पता चलना ऐसी बाध्यकारी परिस्थिति नहीं है, जिसके आधार पर इस्तीफा वापस लेने की अनुमति दी जाए।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कर्मचारी ने अपनी इच्छा से चुनाव लड़ने के लिए इस्तीफा दिया था और इस्तीफे के उद्देश्य के अनुसार चुनाव भी लड़ा। इसलिए सिर्फ चुनाव का परिणाम उम्मीद के मुताबिक नहीं आने को इस्तीफा वापस लेने का पर्याप्त आधार नहीं माना जा सकता।
इस फैसले के साथ हाईकोर्ट ने CAT जयपुर के आदेश को बरकरार रखा और नीरज बिश्नोई की सरकारी सेवा में दोबारा बहाली की मांग को स्वीकार नहीं किया।
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