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न्यायपालिका में नियुक्तियों पर जस्टिस भुइयां की टिप्पणी

Saba Naaz
1 Aug 2026 9:38 PM IST
न्यायपालिका में नियुक्तियों पर जस्टिस भुइयां की टिप्पणी
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नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर कोलेजियम सिस्टम पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि जजों की पदोन्नति और नियुक्ति के लिए कारण सार्वजनिक नहीं करने से पारदर्शिता प्रभावित होती है और इससे ऐसे लोगों के न्यायपालिका में आने का रास्ता खुल सकता है, जो संवैधानिक मूल्यों के विपरीत बयान देते हैं।

जस्टिस भुइयां ने शनिवार को कानूनी थिंक-टैंक ‘विधि’ की एक रिपोर्ट जारी करने के अवसर पर आयोजित चर्चा में यह बात कही। उन्होंने कोलेजियम द्वारा जजों की नियुक्ति और पदोन्नति के प्रस्तावों में कारण नहीं बताए जाने पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि हाल के तीन प्रस्तावों में जजों की पदोन्नति के कारणों का उल्लेख नहीं किया गया है। सवाल उठाते हुए उन्होंने पूछा कि क्या यह पारदर्शिता के सिद्धांत से पीछे हटना नहीं है।

जस्टिस भुइयां ने कहा कि नियुक्तियों के कारण स्पष्ट नहीं होने से उन न्यायाधीशों को नुकसान पहुंचता है, जिन्होंने वास्तव में अच्छा काम किया है और जो योग्य हैं। वहीं दूसरी ओर बिना पर्याप्त चर्चा और कारण बताए नियुक्तियां होने से ऐसे उम्मीदवारों के चयन की संभावना बढ़ जाती है, जो बाद में विवादित या असंवैधानिक टिप्पणियां कर सकते हैं।

उन्होंने कहा कि न्यायपालिका में ऐसे लोगों का प्रवेश रोकने के लिए चयन प्रक्रिया में कुछ स्तर की चर्चा और कारणों का उल्लेख जरूरी है। जस्टिस भुइयां ने किसी व्यक्ति का नाम लिए बिना हाल ही में एक हाई कोर्ट जज की विवादित टिप्पणी का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि ऐसी टिप्पणियां संविधान के मूल सिद्धांतों और मूल्यों के खिलाफ होती हैं।

दरअसल, जस्टिस भुइयां का इशारा इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक तत्कालीन न्यायाधीश की 2024 में की गई टिप्पणी की ओर माना जा रहा है, जिसमें उन्होंने एक कार्यक्रम के दौरान कुछ समुदायों को लेकर विवादित बयान दिया था। इस बयान के बाद राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर काफी विरोध हुआ था।

जस्टिस भुइयां ने कहा कि न्यायपालिका में नियुक्तियां केवल वरिष्ठता या अन्य मानकों के आधार पर नहीं बल्कि व्यक्ति की सोच, संवैधानिक प्रतिबद्धता और न्यायिक क्षमता को ध्यान में रखकर होनी चाहिए। उन्होंने पारदर्शिता को मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर दिया।

कोलेजियम व्यवस्था पर इससे पहले भी कई बार सवाल उठते रहे हैं। भारत में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए वर्तमान में कोलेजियम सिस्टम लागू है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीश मिलकर उच्च न्यायालयों और सुप्रीम कोर्ट में नियुक्तियों के लिए नामों की सिफारिश करते हैं।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने भी कोलेजियम व्यवस्था की आलोचना के संदर्भ में कहा था कि जब सुप्रीम कोर्ट में नियुक्तियों के लिए नामों की सिफारिश की जाती है तो कई पहलुओं पर विचार किया जाता है। इसमें उम्मीदवार का कामकाज, न्यायाधीश के रूप में अनुभव, पहले संभाले गए पद और उनका पूरा पेशेवर रिकॉर्ड शामिल होता है।

वहीं, सुप्रीम कोर्ट में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान भी जजों की नियुक्ति का मुद्दा उठा था। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा था कि अगर कार्यपालिका को किसी दूसरी संस्था के चयन में शामिल किया जाता है तो यह उस संस्था की स्वतंत्रता का सवाल बन सकता है।

इस पर जस्टिस दीपांकर दत्ता ने सवाल किया था कि क्या वास्तव में न्यायाधीश ही न्यायाधीशों का चयन करते हैं। उन्होंने कहा कि इस विषय पर चर्चा जरूरी है। मेहता ने जवाब दिया कि कार्यपालिका और विधायिका सीधे जनता के प्रति जवाबदेह संस्थाएं हैं।

जस्टिस भुइयां की टिप्पणी के बाद एक बार फिर न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया, पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर बहस तेज हो गई है। न्यायपालिका में बेहतर और योग्य लोगों के चयन के लिए प्रक्रिया को और अधिक स्पष्ट बनाने की मांग लंबे समय से उठती रही है।

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