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New York. न्यूयॉर्क। विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र को संबोधित करते हुए आतंकवाद, यूक्रेन संघर्ष और पश्चिम एशिया में जारी तनाव को लेकर भारत का पक्ष रखा। उन्होंने आतंकवाद को शांति के लिए लगातार खतरा बताते हुए कहा कि इसे प्रायोजित करने वाली सरकारों को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए। साथ ही उन्होंने आतंकवाद के खिलाफ भारत की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति को दोहराया।
जयशंकर ने कहा कि आतंकवाद राज्य-प्रायोजित भी हो सकता है और इसका उद्देश्य सीमा पार गतिविधियों को अंजाम देना हो सकता है। ऐसी स्थिति वैश्विक व्यवस्था के लिए सीधी चुनौती बन जाती है। उन्होंने कहा कि आतंकवाद से जुड़ी गतिविधियों में शामिल सरकारों की जवाबदेही तय होनी चाहिए।
विदेश मंत्री ने आतंकवाद के वित्तीय नेटवर्क पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि आतंकवाद के प्रति भारत की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति में किसी तरह की ढील नहीं होनी चाहिए। विशेष रूप से आतंकवाद के वित्तीय पहलुओं को उजागर करने और उनसे निपटने की जरूरत है।
पश्चिम एशिया और मध्य पूर्व की स्थिति का उल्लेख करते हुए जयशंकर ने कहा कि वहां तनाव और हिंसा जारी है। उन्होंने कहा कि भारत का दृढ़ विश्वास है कि स्थायी शांति के लिए ‘टू-स्टेट सॉल्यूशन’ यानी दो-राष्ट्र समाधान जरूरी है। भारत फिलिस्तीनी लोगों के लिए मानवीय सहायता और राहत कार्यों में भी योगदान दे रहा है।
जयशंकर ने कहा कि भारत खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा के क्षेत्र में स्थिति बेहतर बनाने के लिए हर संभव प्रयास करने को तैयार है। उन्होंने कहा कि शांति का अर्थ केवल युद्ध का न होना नहीं है। यदि दुनिया लगातार खतरों और दबावों का सामना करती रहेगी तो स्थिति गंभीर बनी रहेगी। ऐसे में स्थिरता, सुरक्षा और पूर्वानुमान-योग्यता को मजबूत करना जरूरी है।
यूक्रेन संघर्ष का जिक्र करते हुए विदेश मंत्री ने कहा कि यह संघर्ष अब अपने पांचवें साल में है और चिंता का विषय बना हुआ है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बयान का उल्लेख करते हुए कहा कि अंतहीन युद्ध की जगह अब युद्ध को समाप्त करने की कोशिश होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि भारत यूक्रेन में शांति स्थापित करने के लिए चल रही पहलों का समर्थन करता है। इसके साथ ही समुद्री यात्रियों की सुरक्षा तथा भोजन, अनाज और ऊर्जा की आपूर्ति पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है। संयुक्त राष्ट्र के मंच से जयशंकर ने आतंकवाद के खिलाफ सख्ती, यूक्रेन में शांति के प्रयासों, पश्चिम एशिया में दो-राष्ट्र समाधान और वैश्विक खाद्य एवं ऊर्जा सुरक्षा जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाया।
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