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नई दिल्ली: विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने सोमवार को 'लीग ऑफ अरब स्टेट्स' (अरब लीग) के राजनयिकों के एक समूह से मुलाकात की। ये राजनयिक यहां 'सुषमा स्वराज इंस्टीट्यूट ऑफ फॉरेन सर्विस' में प्रशिक्षण ले रहे हैं। इस दौरान, विदेश मंत्री ने मौजूदा संघर्षों के दूरगामी प्रभावों और आज की दुनिया को आकार देने में तकनीक की भूमिका पर जोर दिया।
बातचीत के दौरान, विदेश मंत्री जयशंकर ने राजनयिकों से कहा कि वे भारत में बिताए जाने वाले समय का उपयोग देश और यहां के लोगों को बेहतर ढंग से समझने के लिए करें।
उन्होंने 'X' (ट्विटर) पर लिखा, "सुषमा स्वराज इंस्टीट्यूट ऑफ फॉरेन सर्विस में प्रशिक्षण ले रहे 'लीग ऑफ अरब स्टेट्स' के राजनयिकों के समूह से मिलकर खुशी हुई। हमने मौजूदा संघर्षों के दूरगामी प्रभावों और आज की दुनिया को बदलने में तकनीक की अहम भूमिका पर चर्चा की।"
उन्होंने आगे कहा, "पड़ोसी और 'ग्लोबल साउथ' के साझेदार होने के नाते, मैंने आर्थिक सहयोग को और मजबूत करने की जरूरत पर जोर दिया, ताकि बाधाओं को दूर किया जा सके और अनुचित दबावों को बेअसर किया जा सके। मैंने उन्हें सलाह दी कि वे भारत में अपने समय का इस्तेमाल देश और यहां के लोगों को गहराई से समझने के लिए करें। मैंने उनके लिए एक सार्थक और ज्ञानवर्धक अनुभव की कामना की।"
अगस्त में, विदेश मंत्रालय में सचिव (कॉन्सुलर, पासपोर्ट, वीजा और प्रवासी भारतीय मामले) श्रीप्रिया रंगनाथन ने 'लीग ऑफ अरब स्टेट्स' के सहायक महासचिव खालिद मंज़लावी के साथ बैठक की थी। इस बातचीत का मुख्य फोकस 'भारत-अरब विदेश मंत्रियों की दूसरी बैठक' में अपनाए गए 'एग्जीक्यूटिव प्रोग्राम 2026-28' को आगे बढ़ाने पर था।
भारत के, 'लीग ऑफ अरब स्टेट्स' (जिसे 'अरब लीग' भी कहा जाता है) के सदस्य देशों के साथ पारंपरिक रूप से करीबी और मैत्रीपूर्ण संबंध रहे हैं। अरब लीग का गठन 1945 में काहिरा में हुआ था। शुरुआत में इसके सात सदस्य थे, जिनका उद्देश्य इन देशों के विभिन्न हितों को बढ़ावा देना था। वर्तमान में, अरब लीग में अरब जगत के 22 सदस्य देश शामिल हैं, जिनमें उत्तरी अफ्रीका और पश्चिमी एशिया के देश भी आते हैं।
मिस्र में भारतीय दूतावास के एक बयान के अनुसार, आज अरब लीग के देश भारत के 'विस्तारित पड़ोस' (extended neighbourhood) का हिस्सा हैं। इस क्षेत्र के साथ जुड़ाव को गहरा करने की भारत की प्रतिबद्धता, प्रमुख अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों पर समान दृष्टिकोण, और मजबूत आर्थिक व व्यावसायिक संबंध ही भारत-अरब संबंधों की नींव हैं।
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