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इस्लामिक NATO' को मिलेगी नई ताकत, अरब दुनिया की सबसे बड़ी सेना वाला देश जुड़ने को तैयार

SHIDDHANT
14 Aug 2026 10:47 PM IST
इस्लामिक NATO को मिलेगी नई ताकत, अरब दुनिया की सबसे बड़ी सेना वाला देश जुड़ने को तैयार
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सबसे बड़ी सेना वाला अरब देश शामिल होने को बेकरार
Delhi दिल्ली। मध्य पूर्व और दक्षिण एशिया की सुरक्षा राजनीति में एक नई रणनीतिक हलचल देखने को मिल रही है। सऊदी अरब, तुर्किए और पाकिस्तान के बीच हुए मक्का संयुक्त रक्षा समझौते में अब मिस्र के शामिल होने की संभावना जताई जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर मिस्र इस गठबंधन का हिस्सा बनता है तो यह एक बड़े क्षेत्रीय सुरक्षा समूह के रूप में उभर सकता है, जिसे कुछ विश्लेषक "मुस्लिम NATO" की संज्ञा दे रहे हैं। सऊदी अरब, तुर्किए और पाकिस्तान ने 7 अगस्त को मक्का में त्रिपक्षीय रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इस समझौते के तहत किसी एक सदस्य देश पर सशस्त्र हमला सभी देशों पर हमला माना जाएगा। यह व्यवस्था NATO के सामूहिक रक्षा सिद्धांत के समान बताई जा रही है। अब मिस्र के संभावित जुड़ाव से इस गठबंधन का प्रभाव क्षेत्र और बढ़ सकता है। मिस्र की भौगोलिक स्थिति और सैन्य क्षमता को देखते हुए इसे इस समूह के लिए महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। मिस्र की सेना अरब दुनिया की सबसे बड़ी सेनाओं में से एक है।
मिस्र की एंट्री पर बढ़ी चर्चा
मिस्र के विदेश मंत्री बद्र अब्देलअती ने कहा है कि काहिरा इस समझौते में शामिल होने के विकल्प पर गंभीरता से विचार कर रहा है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि रक्षा संबंधी जिम्मेदारियों और कानूनी पहलुओं की समीक्षा अभी बाकी है। तुर्किए के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने भी मिस्र को इस क्षेत्र का स्वाभाविक साझेदार बताया है। उन्होंने कहा कि कुछ तकनीकी मुद्दों के समाधान के बाद मिस्र के शामिल होने की संभावना बढ़ सकती है। विश्लेषकों के अनुसार, मिस्र के जुड़ने से यह गठबंधन केवल खाड़ी क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूर्वी भूमध्य सागर, लाल सागर, फारस की खाड़ी और दक्षिण एशिया तक इसका प्रभाव बढ़ सकता है।
पाकिस्तान की रणनीतिक भूमिका
इस उभरते गठबंधन में पाकिस्तान की भूमिका को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पाकिस्तान इस समूह का एकमात्र परमाणु हथियार संपन्न देश है, जिसके कारण उसकी रणनीतिक अहमियत बढ़ जाती है। पाकिस्तान की भौगोलिक स्थिति भी उसे खास बनाती है। यह दक्षिण एशिया, मध्य एशिया और मध्य पूर्व के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी है। विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान की सैन्य क्षमता और रक्षा अनुभव इस गठबंधन को मजबूती दे सकते हैं। सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच पहले से ही सैन्य सहयोग, संयुक्त अभ्यास और खुफिया जानकारी साझा करने की व्यवस्था मौजूद है। नया समझौता इसी रक्षा साझेदारी को आगे बढ़ाने की दिशा में देखा जा रहा है।
भारत के खिलाफ नहीं बताया गया गठबंधन
हालांकि इस समझौते को लेकर कुछ चर्चाएं भारत के संदर्भ में भी हो रही हैं, लेकिन आधिकारिक तौर पर इसे भारत विरोधी गठबंधन नहीं बताया गया है। इसके समर्थक इसे क्षेत्रीय सुरक्षा और सहयोग बढ़ाने की पहल के रूप में पेश कर रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह गठबंधन अमेरिका के नेतृत्व वाली पारंपरिक सुरक्षा व्यवस्था से अलग एक क्षेत्रीय और बहुध्रुवीय सुरक्षा मॉडल की ओर संकेत कर सकता है। वहीं, कुछ रणनीतिक मामलों के जानकारों का मानना है कि इस तरह के गठबंधन से पाकिस्तान की क्षेत्रीय भूमिका बढ़ सकती है, लेकिन इससे उसे मध्य पूर्व के जटिल संघर्षों में अधिक सक्रिय भूमिका निभाने का जोखिम भी उठाना पड़ सकता है। यदि मिस्र इस समझौते में शामिल होता है तो मक्का रक्षा समझौता एक बड़े सुरक्षा गठबंधन के रूप में उभर सकता है, जिसका असर आने वाले वर्षों में मध्य पूर्व और वैश्विक राजनीति पर देखने को मिल सकता है।
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