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New Delhi. नई दिल्ली। भारत सरकार ने रूस से कच्चे तेल की खरीद को लेकर अमेरिका और यूरोपीय संघ द्वारा की गई आलोचना को सिरे से खारिज करते हुए तीखी प्रतिक्रिया दी है। विदेश मंत्रालय ने साफ शब्दों में कहा कि यह आलोचना अनुचित, भ्रामक और पूरी तरह बेबुनियाद है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने शनिवार को एक आधिकारिक बयान जारी कर कहा कि भारत की ऊर्जा नीति अपने राष्ट्रीय हितों के अनुरूप है, और रूस से तेल खरीदना कोई राजनीतिक पसंद नहीं बल्कि आर्थिक और रणनीतिक जरूरत है।
क्या है मामला?
हाल के दिनों में अमेरिका और यूरोपीय संघ के कुछ शीर्ष अधिकारियों ने रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच भारत द्वारा रूस से सस्ते दर पर कच्चा तेल खरीदने पर आपत्ति जताई थी। इन देशों का आरोप था कि भारत की इस नीति से रूस को राजस्व मिल रहा है, जिससे उसकी युद्ध नीति को बल मिल सकता है।
MEA का जवाब: ‘कथनी और करनी में फर्क’
इस पर प्रतिक्रिया देते हुए विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि "जो देश भारत की आलोचना कर रहे हैं, वे खुद भी रूस से विभिन्न प्रकार का व्यापार कर रहे हैं। यह हैरानी की बात है कि वे भारत की मजबूरी को नहीं समझना चाहते, जबकि उनके लिए यह कोई राष्ट्रीय अनिवार्यता नहीं है।" उन्होंने कहा कि "भारत पर निशाना साधना न केवल गलत है, बल्कि इन देशों की कथनी और करनी के बीच गहरे विरोधाभास को भी उजागर करता है।"
ऊर्जा जरूरतें और वैश्विक बाजार
जायसवाल ने कहा कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा और उपभोक्ताओं को सस्ती, स्थिर ऊर्जा की आपूर्ति सुनिश्चित करना सरकार की प्राथमिकता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यूक्रेन संघर्ष के बाद पारंपरिक आपूर्तिकर्ता देशों ने अपना ध्यान यूरोप की ओर मोड़ लिया, जिससे भारत के पास विकल्प सीमित हो गए। "उस समय स्वयं अमेरिका ने भारत को वैश्विक ऊर्जा बाजार की स्थिरता बनाए रखने के लिए रूस से तेल खरीदने की स्वीकृति और प्रोत्साहन दिया था," – रणधीर जायसवाल, प्रवक्ता, विदेश मंत्रालय
दोहरे मापदंड पर सवाल
भारत ने अमेरिका और यूरोपीय देशों से यह भी सवाल किया कि जब वे स्वयं रूस से व्यापार कर रहे हैं, तो भारत पर नैतिकता के नाम पर दबाव डालना उचित कैसे है? बयान में कहा गया कि पश्चिमी देशों को पहले अपने गिरेबान में झांकना चाहिए, क्योंकि उनके लिए यह व्यापार आर्थिक लाभ का मामला है, जबकि भारत के लिए यह जनता की बुनियादी जरूरत है।
रणनीतिक दृष्टिकोण से भी जरूरी
विदेश मंत्रालय ने यह भी बताया कि रूस से तेल आयात का निर्णय रणनीतिक सोच पर आधारित था। भारत ने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला की अस्थिरता के बीच नवीन स्रोतों की तलाश की और वह ऊर्जा विविधता की नीति का पालन कर रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की नीति दीर्घकालिक रूप से ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में एक कदम है। भारत को प्रतिदिन लगभग 50 लाख बैरल कच्चे तेल की आवश्यकता होती है, जिसमें से 85% से अधिक आयातित होता है। ऐसे में वैश्विक बाजार की वास्तविकता को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। भारत ने यह भी स्पष्ट किया कि वह रूस-यूक्रेन युद्ध में किसी एक पक्ष के साथ खड़ा नहीं है, बल्कि वह हमेशा संघर्ष विराम, कूटनीति और संवाद का पक्षधर रहा है। भारत की स्थिति तटस्थता और व्यावहारिकता पर आधारित रही है।
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