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अमेरिका-चीन की टक्कर के बीच दुनिया कितनी बदल गई? जयशंकर ने बताया नया समीकरण
jantaserishta.com
4 Oct 2026 5:42 PM IST

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नई दिल्ली: विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने रविवार को नई दिल्ली में आयोजित म्यूनिख लीडर्स मीटिंग में तेजी से बदलते वैश्विक राजनीतिक समीकरणों पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि मौजूदा अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को समझने के लिए अमेरिका के बदलते रुख और चीन के लगातार बढ़ते प्रभाव को देखना जरूरी है। उनके मुताबिक, दुनिया अब केवल अमेरिका और चीन के बीच मुकाबले तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि कई दूसरे देश भी अपने हितों और उपलब्ध संसाधनों के आधार पर नई रणनीति बना रहे हैं।
अमेरिका के रुख में बड़ा बदलाव क्यों अहम है?
जयशंकर ने मौजूदा वैश्विक स्थिति की पहली बड़ी विशेषता अमेरिका की विदेश नीति में आए बदलाव को बताया। उन्होंने कहा कि यह बदलाव अमेरिका की अपनी रणनीतिक पसंद का हिस्सा है और इसके चलते वह पहले की तुलना में अधिक अकेली शक्ति के रूप में आगे बढ़ रहा है।
उनके मुताबिक, लंबे समय तक अमेरिका ने वैश्विक व्यवस्था में बड़ी भूमिका निभाई है, लेकिन अब अंतरराष्ट्रीय समीकरण बदल रहे हैं। इस बदलाव का असर दूसरे देशों की रणनीतियों पर भी दिखाई दे रहा है।
चीन का बढ़ता प्रभाव बना दूसरा बड़ा स्तंभ
जयशंकर ने चीन के उभार को वैश्विक व्यवस्था की दूसरी प्रमुख विशेषता बताया। उन्होंने कहा कि चीन खुद को दुनिया में एक अलग और विशिष्ट शक्ति के रूप में देखता है और उसकी आर्थिक क्षमता का असर अब वैश्विक राजनीति पर भी दिखाई दे रहा है।
अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा का असर केवल दोनों देशों के संबंधों तक सीमित नहीं है। जयशंकर के मुताबिक, इसका प्रभाव व्यापार, तकनीक, सप्लाई चेन, रणनीतिक साझेदारी और दूसरे देशों की विदेश नीति तक पहुंच रहा है।
दूसरे देशों के लिए क्यों बढ़ी मुश्किल?
विदेश मंत्री ने कहा कि अमेरिका-चीन की प्रतिस्पर्धा ने अलग-अलग देशों के पास मौजूद प्रभाव और संसाधनों के इस्तेमाल को भी बदल दिया है। यानी आर्थिक ताकत, तकनीक, बाजार, कनेक्टिविटी और दूसरे रणनीतिक साधन अब अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा का हिस्सा बनते जा रहे हैं।
हालांकि, उन्होंने यह भी बताया कि देशों के बीच प्रतिस्पर्धा के साथ आपसी निर्भरता भी बनी हुई है। इसलिए कोई भी देश पूरी तरह किसी एक शक्ति से अलग होकर अपनी रणनीति नहीं बना सकता।
क्वाड, ब्रिक्स और कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट का उदाहरण
जयशंकर ने बताया कि कई उभरती और मध्यम शक्तियां ऐसे क्षेत्रों में एक-दूसरे के साथ सहयोग कर रही हैं, जहां उनके हित मिलते हैं। उन्होंने क्वाड का उदाहरण देते हुए कहा कि अलग-अलग देश साझा हितों के आधार पर साथ आ रहे हैं।
उन्होंने भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे, अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे और नॉर्दर्न सी रूट जैसे कनेक्टिविटी प्रयासों का भी उल्लेख किया। इसके अलावा ब्रिक्स, अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन और आपदा रोधी बुनियादी ढांचे के लिए गठबंधन को भी उन्होंने सहयोग के उदाहरण के रूप में सामने रखा। उनके मुताबिक, ऐसे मंचों के जरिए देश अपनी सामूहिक आवाज को ज्यादा प्रभावी बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
तेजी से बढ़ रही बहुध्रुवीय दुनिया
जयशंकर ने वैश्विक व्यवस्था में बहुध्रुवीयता के बढ़ते प्रभाव की भी चर्चा की। उनका कहना था कि आज देशों के लिए कई अलग-अलग शक्तियों के साथ संबंध बनाए रखना जरूरी हो गया है, भले ही हर मुद्दे पर उनके हित पूरी तरह एक जैसे न हों।
ऐसे माहौल में देश अपने जोखिम कम करने, साझेदारियां बढ़ाने और अलग-अलग विकल्प खुले रखने की कोशिश कर रहे हैं। जयशंकर के मुताबिक, यही बदलती वैश्विक व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
उन्होंने यह भी संकेत दिया कि आने वाले समय में दुनिया की दिशा केवल अमेरिका और चीन जैसे बड़े देशों के फैसलों से तय नहीं होगी। मध्यम और उभरती शक्तियां भी अपने हितों के अनुसार नए समूह, साझेदारी और सहयोग के रास्ते बना रही हैं।
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