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RSS के मार्च पर रोक को लेकर हाईकोर्ट की टिप्पणी, सरकार के रवैये पर जताई चिंता
jantaserishta.com
14 Oct 2026 3:52 PM IST

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नई दिल्ली: मद्रास हाईकोर्ट ने तमिलनाडु में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के रूट मार्च की अनुमति नहीं दिए जाने पर पुलिस से सवाल किए हैं। जस्टिस वी. लक्ष्मीनारायणन ने पूछा कि जब जम्मू-कश्मीर में मार्च निकाला जा सकता है, तो तमिलनाडु में बार-बार अनुमति क्यों रोकी जाती है। सरकार ने त्योहारों के दौरान पुलिस बल की कमी और आम लोगों को होने वाली परेशानी का हवाला दिया। अदालत ने याचिकाकर्ता पक्ष के पांच सदस्यों को राज्य के पब्लिक प्रॉसिक्यूटर से मिलकर शांतिपूर्ण आयोजन का रास्ता निकालने को कहा है।
RSS के मार्च को अनुमति नहीं मिलने पर हाईकोर्ट ने उठाए सवाल
तमिलनाडु में RSS के रूट मार्च को लेकर मद्रास हाईकोर्ट ने राज्य पुलिस से जवाब मांगा है। बुधवार को मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस वी. लक्ष्मीनारायणन ने सवाल किया कि अगर जम्मू-कश्मीर में RSS को मार्च निकालने की अनुमति मिल सकती है, तो तमिलनाडु में हर साल इस पर रोक क्यों लगाई जाती है।
न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि सरकार नागरिकों के साथ ऐसा व्यवहार कर रही है, जैसे वे उसके विरोधी हों। उन्होंने यह भी कहा कि अलग-अलग सरकारों के कार्यकाल में भी RSS को मार्च निकालने की अनुमति नहीं मिलती। अदालत ने पुलिस से पूछा कि आखिर ऐसी अनुमति देने में उसे किस बात का डर है।
यह मामला RSS सदस्य वीजी जगदीशन की याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया। उन्होंने 18 अक्टूबर, 25 अक्टूबर, 1 नवंबर या किसी दूसरी तारीख को रूट मार्च निकालने की अनुमति मांगी है।
सरकार ने पुलिस बल की कमी और जनता को परेशानी का दिया तर्क
राज्य सरकार की ओर से पेश एडवोकेट जनरल विजय नारायण ने अदालत को बताया कि मार्च की अनुमति मिलने पर बड़ी संख्या में पुलिसकर्मियों को तैनात करना पड़ेगा। त्योहारों के दौरान पुलिस पहले से ही कई जिम्मेदारियां संभाल रही होती है। सरकार का कहना था कि जुलूस के कारण खरीदारी के लिए बाहर निकले लोगों और आम जनता को भी परेशानी हो सकती है। इसी आधार पर मार्च की अनुमति देने को लेकर आपत्ति जताई गई।
इस पर जस्टिस लक्ष्मीनारायणन ने RSS के स्थापना दिवस और दशहरे के अवसर पर मार्च निकालने की परंपरा का जिक्र किया। उन्होंने सवाल किया कि संगठन का स्थापना दिवस मनाने के लिए रूट मार्च निकालने में गलत क्या है।
हिंसा से जुड़े ठोस उदाहरण मांगे
सुनवाई के दौरान RSS के पुराने आपराधिक मामलों का उल्लेख भी किया गया। इस पर न्यायाधीश ने संगठन के मार्च से जुड़ी हिंसा के ठोस उदाहरण पेश करने को कहा। उन्होंने पूछा कि ऐसे मामलों में दर्ज आपराधिक मुकदमों का विवरण कहां है।
अदालत ने संवैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए कार्यक्रम आयोजित करने की मांग करने वाले नागरिकों के प्रति राज्य के रवैये पर भी चिंता जताई। सुनवाई में अनुमति देने से इनकार करने के पीछे बताए गए कारणों और सुरक्षा संबंधी आशंकाओं पर चर्चा हुई।
RSS ने कहा- हर साल अनुमति के लिए अदालत आना पड़ता है
RSS की ओर से वरिष्ठ वकील एनएल राजा ने कहा कि पुलिस हर साल रूट मार्च की अनुमति देने से इनकार कर देती है। इसके बाद संगठन को कार्यक्रम की इजाजत पाने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ता है।
उन्होंने 2024 का उदाहरण भी दिया, जब संगठन को मार्च की अनुमति नहीं मिली थी और उसे न्यायालय में याचिका दाखिल करनी पड़ी थी। दूसरी ओर, राज्य सरकार की ओर से यह दलील दी गई कि जिस स्थान पर मार्च निकालने का प्रस्ताव है, उसे सार्वजनिक सभा आयोजित करने के लिए अधिसूचित नहीं किया गया है। सरकार ने इसी आधार पर अनुमति रोके जाने की बात कही।
शांतिपूर्ण आयोजन का रास्ता तलाशने को कहा
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता पक्ष के पांच सदस्यों को राज्य के पब्लिक प्रॉसिक्यूटर से मुलाकात करने का निर्देश दिया। अदालत ने उनसे कहा कि वे बातचीत के जरिए शांतिपूर्ण तरीके से मार्च आयोजित करने का समाधान निकालने की कोशिश करें।
अब इस मामले में अगली सुनवाई गुरुवार को होगी। अदालत में होने वाली आगे की सुनवाई से यह स्पष्ट हो सकेगा कि RSS के प्रस्तावित रूट मार्च को लेकर राज्य सरकार और संगठन के बीच कोई सहमति बनती है या नहीं। फिलहाल, अनुमति को लेकर विवाद न्यायालय के विचाराधीन है।
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