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बिलासपुर: बिजली कनेक्शन शिफ्ट करने के एवज में रिश्वत लेने के 25 साल पुराने मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राज्य विद्युत मंडल के तत्कालीन सब इंजीनियर बृज नरेश सिंह की दोषसिद्धि को बरकरार रखा है। हालांकि अदालत ने उनकी उम्र और घटना के बाद बीते लंबे समय को देखते हुए भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 के तहत दी गई एक साल की सश्रम कारावास की सजा को घटाकर छह महीने कर दिया है।
महाराणा प्रताप नगर, बिलासपुर निवासी बृज नरेश सिंह ने प्रथम अपर सत्र न्यायाधीश बिलासपुर द्वारा 31 जनवरी 2005 को सुनाए गए फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। मामले की सुनवाई जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास की अदालत में हुई। हाईकोर्ट ने 7 जुलाई को सुनवाई पूरी होने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था और 24 सितंबर 2026 को निर्णय सुनाया।
बिजली कनेक्शन शिफ्ट करने से जुड़ा था मामला
मामले के अनुसार शिकायतकर्ता सरकारी जमीन पर वर्कशॉप संचालित कर फैब्रिकेशन का काम करता था। वर्कशॉप में बिजली कनेक्शन से जुड़ी प्रक्रिया के दौरान कनेक्शन शिफ्ट कराने की जरूरत पड़ी थी। इसी काम के एवज में तत्कालीन सब इंजीनियर बृज नरेश सिंह पर रिश्वत मांगने का आरोप लगा था। शिकायत के आधार पर भ्रष्टाचार से जुड़े मामले में कार्रवाई की गई और जांच के बाद प्रकरण अदालत तक पहुंचा।
निचली अदालत ने सुनाई थी सजा
प्रथम अपर सत्र न्यायाधीश बिलासपुर ने 31 जनवरी 2005 को मामले में बृज नरेश सिंह को दोषी करार दिया था। अदालत ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत उन्हें सजा सुनाई थी। इस फैसले के खिलाफ आरोपी ने हाईकोर्ट में अपील दायर की और निचली अदालत के निर्णय को चुनौती दी।
हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि में नहीं किया हस्तक्षेप
हाईकोर्ट ने मामले के रिकॉर्ड, साक्ष्य और निचली अदालत के फैसले का परीक्षण करने के बाद दोषसिद्धि को सही माना। अदालत ने स्पष्ट किया कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर निचली अदालत द्वारा आरोपी को दोषी ठहराने के निष्कर्ष में हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। हालांकि सजा की अवधि तय करते समय अदालत ने मामले की पुरानी अवधि और आरोपी की वर्तमान उम्र को ध्यान में रखा।
एक साल से घटाकर छह महीने की सजा
हाईकोर्ट ने धारा 7 के तहत दी गई एक साल की सश्रम कारावास की सजा को घटाकर छह महीने कर दिया। अदालत ने माना कि घटना को करीब 25 साल बीत चुके हैं और आरोपी की उम्र भी बढ़ चुकी है। इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए कोर्ट ने सजा में राहत दी, लेकिन दोषसिद्धि को बरकरार रखा।
24 सितंबर को आया फैसला
जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास ने 7 जुलाई को मामले में फैसला सुरक्षित रखा था। इसके बाद 24 सितंबर 2026 को निर्णय सुनाते हुए हाईकोर्ट ने अपील का निपटारा किया। इस आदेश के साथ 25 साल पुराने रिश्वत मामले में कानूनी प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण चरण पूरा हो गया है।
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